धर्मराज की सीख
   Date06-Jul-2019

प्रेरणादीप
एक साधु नदी के तट पर एक छोटी-सी कुटिया में रहकर भजन-साधना में लीन रहते थे। उन्होंने जीवन में कभी असत्य न बोलने का संकल्प लिया था। एक दिन वे उपासना में लीन थे कि एक ी-पुरुष को बचाओ-बचाओ की गुहार लगाते हुए आते हुए देखा। दोनों बाईं ओर के जंगल में झाडिय़ों में विलीन हो गए। कुछ ही देर बाद हाथों में तलवार लिए हुए डाकू वहां पहुंचे। उनके सरदार ने ऋषि कौशिक से पूछा-'महाराज! क्या आपने एक ी-पुरुष को इधर आते हुए देखा है? वे किस दिशा में गए हैं?Ó ऋषि समझ गए कि डाकू उनका पीछा कर रहे हैं। पहले तो वे बताने में झिझके, परंतु संकल्प की याद आते ही उन्होंने बता दिया कि वे किस दिशा में गए हैं। डाकुओं ने उन ी-पुरुष को पकड़ लिया और उनकी हत्या कर दी। जब साधु की मृत्यु हुई तो उन्हें नरकवास का आदेश सुनाया गया। उन्होंने धर्मराज से कहा-'मैंने जीवनपर्यंत साधना, भजन किया, सत्य-संकल्प का पालन किया, फिर भी मुझे नरक क्यों ले जाया जा रहा है?Ó धर्मराज बोले-'सत्य व असत्य, धर्म व अधर्म का निर्णय विवेक के द्वारा किया जाता है। तुम्हारे द्वारा बोले गए सत्य के कारण एक ी-पुरुष की असमय मृत्यु हो गई। इसलिए तुम्हें नरक भोगना पड़ेगा।Ó