राहुल के इस्तीफे से उभरे सवाल
   Date05-Jul-2019

2019 चुनाव में जनता द्वारा नकारे जाने के बाद कांग्रेस में जहां घबराहट के साथ नेतृत्व पर दोषारोपण और एक दूसरे पर पराजय का ठीकरा फोडऩे का सिलसिला प्रारंभ हुआ। यह भी कहा गया कि अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस्तीफे की पहल की है, इसके बाद दरबारी और परिक्रमा करने वाले राहुल गांधी को अध्यक्ष पद पर बने रहने की गुहार लगाते रहे। जब राहुल गांधी की ओर से इस बात पर नाराजी व्यक्त की कि जिम्मेदार लोगों को इस्तीफा देना चाहिए, तब संगठन से जुड़े छोटे-बड़े 150 पदाधिकारियों ने इस्तीफा दिया। कांग्रेस शासित राज्यों के मुख्यमंत्री अपने पद पर बने रहे, लेकिन गेहलोत, कमलनाथ के साथ अन्य दो मुख्यमंत्रियों ने भी राहुल गांधी पर बने रहने का अनुरोध किया। इस संदर्भ में उल्लेख करना होगा कि राहुल गांधी ने नाराजी व्यक्त की थी कि कुछ पदाधिकारियों ने अपने बेटों को जिताने में अपना ध्यान केन्द्रित किया, इसलिए अन्य प्रत्याशियों को पराजय का सामना करना पड़ा। इसके बाद भी अशोक गेहलोत और कमलनाथ मुख्यमंत्री पद पर बने रहे, यह ड्रामा चुनाव के परिणाम आने के बाद 39 दिनों तक चलता रहा। अब राहुल गांधी ने चार पृष्ठों का इस्तीफा ट्वीट के द्वारा सार्वजनिक कर दिया है। राहुल गांधी ने पराजय की जिम्मेदारी लेते हुए ट्वीट में कहा कि अन्य जिम्मेदार नेताओं को भी पराजय की जिम्मेदारी लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि आरएसएस और सरकारी अधिष्ठानों से अकेले लड़ाई लड़ी। उन्होंने अपने ट्वीट में वे ही बातें दोहराई जो अपने भाषणों में दोहराते रहे हैं, मुझे भाजपा के प्रति नफरत नहीं है, मेरे शरीर का कण-कण भारत के प्रति उनके विचार का विरोध करते हैं, चुनाव आयोग की पारदर्शिता पर भी सवाल उठाए, जहां वे मतभेद देखते हैं, मैं समानता देखता हूं। भारत की एक आवाज नहीं हो सकती आदि बातों से यही लगता है कि जनादेश को नम्रता से स्वीकार करने की बजाय स्थापित संस्थाओं पर पराजय का ठीकरा फोडऩे की कोशिश की गई। उन्होंने यह भी गंभीर आरोप लगाया कि संस्थागत तटस्था खत्म हुई, अब चुनाव औपचारिक रहेंगे। इस कथन से सवाल उठता है कि राहुल मान चुके हैं कि वे निराश हो चुके हैं और उन्हें कांग्रेस का कोई भविष्य दिखाई नहीं देता। क्या राहुल मान चुके हैं कि कांग्रेस अब केवल इतिहास में दर्ज हो जाएगी। अगला कार्यकारी अध्यक्ष होगा कांग्रेस का ताज किसी वरिष्ठ नेता के सिर पर रखा जाएगा, यह निर्णय कार्य समिति करेगी। संभावना है कि कार्य समिति पहले की तरह राहुल से पद पर बने रहने का निवेदन करेगी। जो भी हो, लेकिन कांग्रेस इस परिवार के रिमोट कंट्रोल से ही चलती रही है। मोतीलाल नेहरू से लेकर राहुल तक अर्थात् नेहरू-गांधी परिवार की पांच पीढ़ी का कांग्रेस पर वर्चस्व रहा है।
दृष्टिकोण
नव विकल्प की संभावना ?
हजारों वर्षों के इतिहास की विरासत भारत के पास होने से देव, दानव, राम-रावण से लेकर कौरव-पांडव के युद्ध और उसके कारणों का इतिहास हमें ग्रंथों में मिलता है। दार्शनिक प्लेटो का भरोसा था कि जब तक राजा दार्शनिक नहीं होता, तब तक आदर्श राज्य नहीं हो सकता। हमारे यहां तो श्रीराम, कृष्ण से लेकर अनेक सम्राटों ने राजधर्म के अनुसार राज किया। इन्हें राज ऋषि कहा गया, ये सब दार्शनिक ही थे। कई प्रकार की राज्य व्यवस्थाओं का अनुभव भारत को रहा है। परिवर्तन चक्र के साथ कई बदलाव हुए, मुगलों और अंग्रेजों की गुलामी का भी दर्द हमने भुगता है। वर्तमान लोकतांत्रिक व्यवस्था में भी जनता ने बदलाव में भागीदारी की है। हमारे यहां स्थापित संस्थाओं या राज्य व्यवस्था के खिलाफ भी संघर्ष हुए। इसलिए परिवर्तन काल के कपाल पर दस्तक देता रहा। इसलिए जो लोग कांग्रेस के भविष्य को लेकर चिन्तित है। यही भी कहा जाता है कि लोकतंत्र में सशक्त विपक्ष का होना जरूरी है। कांग्रेस के सदस्यों की संख्या केवल 52 है, जबकि सत्ता पक्ष में साढ़े तीन सौ की संख्या है। इसलिए नगाड़ों की आवाज में मेंढको की टर्र-टर्र सुनाई नहीं देती। कांग्रेस के अंत के बाद भी कोई सशक्त विकल्प खड़ा हो सकता है। इसलिए जिस तरह नवभारत का निर्माण हो रहा है उसी तरह नव विपक्ष की भूमि भी तैयार हो सकती है। कांग्रेस की 134 वर्ष की यात्रा का अंत तो होना है। जिन कारणों और जिन विचारों को जनता का नकारा मिला है, लेकिन विचार मंथन का दौर हमेशा जारी रहा है। समय और परिस्थिति के कारण विचारों की प्रासंगिकता पर सवाल उठते रहे। जिस तरह भारत का राष्ट्रवाद संस्कृति पर आधारित है, जबकि हिटलर मुसोलिनी का राष्ट्रवाद फासीवाद पर आधारित था, अपने राष्ट्र के प्रति निष्ठा, समर्पण और जीवन खपा देने की प्रेरणा हमें हमारी विरासत में मिली है।