बापू की सादगी
   Date05-Jul-2019

प्रेरणादीप
स्व राज्य आंदोलन के दिनों की बात है। राजकोट में काठियावाड़ राज्य के प्रजा परिषद् का अधिवेशन हो रहा था। बापू अन्य नेताओं के साथ मंचासीन थे। तब ही उनकी दृष्टि एक वृद्ध सज्जन पर पड़ी। गांधीजी को वे कुछ जाने-पहचाने से लगे। स्मरण शक्ति पर जोर देने पर उन्हें याद आया कि वे तो उनके प्राथमिक पाठशाला के अध्यापक हैं। बापू शीघ्र ही मंच से उतरकर उनके पास गए और उनके चरणों के समीप बैठ गए। उन्होंने उनसे परिवार की कुशल क्षेम पूछी। जब बहुत समय इसी प्रकार व्यतीत हो गया तो उनके अध्यापक ने बापू से कहा- 'अब आप मंच पर पधारिए। नेतागण आपकी प्रतीक्षा कर रहे होंगे।Ó बापू बोले- 'नहीं-नहीं मैं यहीं पर ठीक हूं। अब मैं मंच पर नहीं जाना चाहता। यहीं बैठकर सारा कार्य देखूंगा। आप चिंता न कीजिए।Ó सभा समाप्त होने पर बापू चलने लगे तो अध्यापक ने गद्गद् होकर आशीर्वाद दिया- 'जो व्यक्ति तुम जैसा निरहंकारी हो, महान कहलाने का अधिकारी वही हो सकता है।Ó