पाकिस्तान में अल्पसंख्यकों के लिए फांसी बनता ईशनिंदा
   Date05-Jul-2019

मलिक असगर हाशमी
'इ स्लामिक लोकतांत्रिकÓ देश पाकिस्तान का ईशनिंदा कानून वहां के अल्पसंख्यकों के लिए जी का जंजाल बन गया है। कानून में अनेक पेंच होने से वहां के बहुसंख्यक व्यक्तिगत लाभ अथवा पड़ोसी से दुश्मनी निकालने के लिए इसका भरपूर दुरूपयोग कर रहे हैं। चूंकि पाकिस्तान में कट्टरवादी जमातें हावी हैं, इसलिए ईशनिंदा के बहाने वे अल्पसंख्यकों को निरंतर परेशान कर रहे हैं, उन्हें देश छोडऩे को मजबूर कर रहे हैं। इस तरह के अधिकांश मामलों में एकतरफा सुनवाई कर आरोपियों को जेल में डाल दिया जाता है।
ईशनिंदा कानून पर शोध करने वाली संस्था 'प्यू रिसर्चÓ की एक रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया के 26 देशों में ईशनिंदा कानून के तहत सजा का प्रावधान है, जिनमें पाकिस्तान ऐसे कानूनों के दुरुपयोग में सबसे आगे है। यहां कट्टरपंथी कानून हाथ में ले लेते हैं फिर भी उनके विरुद्ध कोई कार्रवाई नहीं की जाती। एक रिपोर्ट में कहा गया है कि 1990 से अब तक पाकिस्तान में ईशनिंदा के नाम पर उन्मादी भीड़ 69 लोगों की हत्या कर चुकी है। वहां की विभिन्न जेलों में 40 से अधिक लोग उम्रकैद काट रहे हैं, जिन पर ईशनिंदा कानून के उल्लंघन का आरोप है। ऐसे में पाकिस्तान हिन्दू परिषद् का आरोप है कि निजी स्वार्थ में कानून के दुरुपयोग और कट्टरपंथियों के दबाव में अल्पसंख्यकों को लगातार निशाना बनाया जा रहा है। पिछले दिनों दक्षिण सिंध प्रांत के मीरपुर खास के फुलाइया नगर में स्थानीय मस्जिद के एक मौलवी इशाक के एक बयान पर मुसलमानों ने वहां के एक हिन्दू पशु चिकित्सक रमेश कुमार के क्लिनिक में आग लगा दी। साथ ही भीड़ ने हिन्दू दुकानदारों के व्यापारिक प्रतिष्ठानों को आग के हवाले कर दिया। बलवाइयों ने एक बार भी डॉक्टर का पक्ष जानने की कोशिश नहीं की। मौलवी का आरोप था कि डॉक्टर रमेश ने 'कुरान का पन्ना फाड़कर उसमें दवाइयां लपेट कर दी थीं।Ó क्या इस्लामी देश में कोई भी ऐसा करने का जोखिम उठा सकता है? इस मामले में जाहिर है, मंशा अल्पसंख्यकों को निशाना बनाने की थी, बस बहाने की तलाश थी। इस घटना से कुछ रोज पहले ही कट्टरपंथियों के दबाव में पंजाब के गुजरांवालां के निरक्षर ईसाई दंपत्ति शगुफ्ता कौसर और शफकत मसीह के खिलाफ निचली अदालत ने 'कुरान और पैगंबर के अपमानÓ के लिए उन्हें मौत की सजा सुनाई है। आरोप है कि यह दंपत्ति मुसलमानों को ईशनिंदा वाले संदेश भेजा करते थे, जिसकी शिकायत उनकी पड़ोसन ने पुलिस में कर दी। हास्यास्पद है कि पुलिस और स्थानीय अदालत ने प्राथमिक सबूतों पर विचार किए बिना आरोपियों को दोषी ठहरा दिया। इस्लाम में रमजान-ईद के चांद को लेकर एक महिला की गवाही सही नहीं मानी जाती।
इस्लामी नियम-शर्तों के अनुसार मुसलमान एक से अधिक औरतों की गवाही पर ही चांद दिखने या न दिखने पर यकीन कर सकते हैं। यह अलग बात है कि कई बार फिरकाबंदी के कारण एक फिरके के लोग दूसरे की बात नहीं मानते। शगुफ्ता के मामले में एक औरत की गवाही को ही सच मान लिया गया। ब्रिटिश पाकिस्तानी क्रिश्चियन एसोसिएशन के अध्यक्ष विल्सन चौधरी ने इस फैसले पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि निरक्षर दंपत्ति दूसरों को कैसे संदेश लिखकर भेज सकते हैं? अदालत को सजा सुनाने से पहले इस महत्वपूर्ण सवाल पर गौर करना चाहिए था? उन्होंने सरकार और सुप्रीम कोर्ट सेे मामले में पहल कर पति-पत्नी को बरी करने की गुहार की है। इससे पहले ईसाई महिला आसिया बीबी के मामले में पाकिस्तान की निचली अदालतों की वजह से सरकार की किरकिरी हुई थी। 2010 में चार बच्चों की मां आसिया बीबी पर उसकी मुस्लिम पड़ोसन ने व्यक्तिगत दुश्मनी निकालने के लिए ईशनिंदा का आरोप लगाया था। उनके बीच विवाद की शुरुआत एक गिलास में पानी पीने से हुई थी। बाद में कट्टरपंथियों के बीच में आने से विवाद बढ़ गया। बात पुलिस से होते हुए अदालत पहुंच गई। अन्य मामलों की तरह अदालत ने एकतरफा फैसला सुनाते हुए आसिया बीबी को मौत की सजा सुनाई। लेकिन उनके वकील सैफुल मलूक फैसले के विरूद्ध निरंतर कानूनी लड़ाई लड़ते रहे।
परिणामस्वरूप पिछले वर्ष 31 अक्टूबर को आसिया बीबी को बा-इज्जत बरी कर दिया गया, जिस पर कट्टरपंथी संगठन 'तहरीक-ए-लब्बैकÓ ने खूब सवाल किया। सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय के विरोध में इस्लामाबाद सहित पाकिस्तान के कई शहरों को कई दिनों तक बंधक बनाए रखा गया था। मुल्क की स्थिति बिगडऩे पर आसिया बीबी और उनके वकील को दूसरे देश में शरण लेनी पड़ी। आसिया इस समय कनाडा में परिवार के साथ रह रही हैं। उनके देश छोडऩे के बावजूद पाकिस्तानी अवाम उनका पीछा नहीं छोड़ रही है। आसिया को ईशनिंदा का प्रतीक बना दिया गया है। गत ईद मिलादुन्नबी यानी पैगंबर मोहम्मद के जन्मदिन पर कराची में तख्तियां लेकर आसिया के खिलाफ प्रदर्शन किया गया। क्रिश्चियन एसोसिएशन के अध्यक्ष विल्सन चौधरी इसे ईसाई समुदाय का अपमान मानते हैं। कट्टरपंथी ईशनिंदा कानून का विरोध करने वालों को भी नहीं बख्शते। एक मामले में 4 जनवरी 2011 को पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के गवर्नर सलमान तासीर के अंगरक्षक मुमताज ओदरी ने गोली मारकर उनकी हत्या कर दी थी। आरोपी का कहना था कि तासीर के ईशनिंदा कानून का विरोध करने से वह नाराज था। इस घटना के एक महीने बाद ही कानून में संशोधन संबंधी याचिका दायर करने पर पाकिस्तान में एकमात्र ईसाई काबिना मंत्री शाहबाज भट्टी को मौत के घाट उतार दिया गया था। उन्हें गोली मारने वाले 'तालिबान अल-कायदा पंजाबÓ ने घटनास्थल पर एक पर्चा छोड़ा था जिसमें घटना की जिम्मेदारी लेते हुए ईशनिंदा कानून का विरोध करने वालों को अंजाम भुगतने की धमकियां दी गई थीं। इस्लामाबाद हाईकोर्ट के जज शौकत अजीज सिद्दिकी ईशनिंदा कानून में बदलाव के पैरोकार माने जाते हैं, जिस पर उन्हें भी धमकियां मिलती रही हैं।
पाकिस्तान में एक तबका ऐसा भी है जो इन बातों की परवाह किए बगैर ईशनिंदा कानून में बदलाव की लगातार पैरवी कर रहा है। इस कानून को सबसे पहले ब्रिटिश शासनकाल में वर्ष 1860 में संहिताबद्ध किया गया था, जबकि 1927 में कानून का विस्तार किया गया। विभाजन के बाद पाकिस्तान ने अंग्रेजों के इस कानून को पूरी तरह आत्मसात कर लिया। जनरल जिया-उल हक की सैन्य सरकार में 1980-86 में इस कानून में कई और धाराएं जोड़कर इसके लचीलेपन को खत्म करके एक तरह से कानून का इस्लामीकरण कर दिया गया। इस कानून के तहत अहमदी समुदाय को भी गैर-मुस्लिम करार दे दिया गया था।
पाकिस्तान- इस देश में ईशनिंदा कानून को कई चरणों में बनाया गया और उसका विस्तार किया गया। इसकी एक धारा में उल्लेख है कि कोई इस्लामी व्यक्ति के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करता है तो उसे तीन साल तक की जेल हो सकती है। 1982 और फिर 1986 में इसमें नई धाराएं जोड़ दी गई है, जिसमें प्रावधान है कि कुरान को अपवित्र करने पर उम्रकैद और पैगंबर मोहम्मद के खिलाफ ईशनिंदा पर मौत या उम्र कैद की सजा हो सकती है। सऊदी अरब- सऊदी अरब में लागू शरिया कानून के तहत ईशनिंदा करने वाले नास्तिक माने जाते हैं जिसकी सजा मौत है। 2014 में सऊदी अरब में दहशतगर्दी से निपटने के लिए नया कानून बनाया गया था।