योगी की सीख
   Date04-Jul-2019

प्रेरणादीप
प र्यटन के उद्देश्य से आए तथाकथित विद्वानों में से कुछ भटककर समूह से अलग होकर भूलवश हिमालय के दुर्गम क्षेत्र में प्रविष्ट हो गए। देवात्मा हिमालय की अद्वितीय सौंदर्यरूपी बिखरी छटा के मध्य भी वे अपनी पैनी तार्किक तलवार लिए अच्छाई-बुराई की काट-छांट में व्यस्त थे। आपसी चर्चा में क्षेत्र के स्थूल परिदृश्य को पिछड़ेपन की दृष्टि से देखते एवं भौतिक विकास क्रम में स्वयं की बौद्धिक संपन्नता की अग्रिमता का दंभ प्रदर्शन किए वे आगे बढ़ ही रहे थे कि उनकी दृष्टि निकट ही चबूतरे पर बैठे एक योगी पर पड़ी, जो एक गहरे ध्यान में निमग्न प्रतीत होते थे। उनकी ध्यानस्थ छवि को निहार कुछ क्षण तो वे शांत स्थिति में रहे, किंतु जल्द ही प्रवृत्तिवश अनमने ढंग से पाखंड की कल्पना कर कुछ हंसते हुए आगे बढ़ ही रहे थे कि योगी की आत्मचेतना ने उनके विकृत मनोभावों को ताड़ा और अपने नेत्र खोल उनको सन्मार्ग दिखाने के उद्देश्य से कहना आरंभ किया-'हिमालय में अवस्थित ऋषियों एवं योगियों की सत्ताओं व साथ ही परिदृश्य को स्थूल दृष्टिकोण की परख से पिछड़ा मान लेना अज्ञानजन्य मूढ़ता ही कही जाएगी। परोक्ष जगत के विस्तार का आंशिक भाग स्थूल संसार के रूप में दृष्टिगोचर होता है, जिसे लेकर दंभ प्रदर्शन करना तो बालकौतुक के समान है। स्वर्ग सदृश्य हिमालय की इन दिव्यवादियों में ऋषिसत्ताएँ परमार्थ-प्रयोजनों हेतु निरंतर तप में संलग्न हैं। भले ही परिदृश्य कुछ स्तब्ध एवं शांत जान पड़ता हो, किंतु सत्य बात कुछ और ही है, जिसे शांति कहते हैं, वह क्रियाशीलता की चरम अवस्था है। लट्टू जब पूरी तेजी के साथ घूमता है, तब शांत-स्थिर दिखता है, परंतु वह तब भी क्रियाशील होता है।