जैन दर्शन में उल्लेखित मानव मुक्ति के मार्ग
   Date04-Jul-2019

धर्मधारा
जै न दर्शन अत्यंत प्राचीन दर्शन है। इसमें मानव उत्कर्ष के अनेक सिद्धांतों का विवेचन किया गया है। भारतीय दार्शनिक परंपरा में इसे नास्तिक दर्शन की श्रेणी में रखा जाता है, क्योंकि यह ईश्वर की उपस्थिति पर विश्वास नहीं करता। नास्तिक होते हुए भी इसमें बंधन एवं मोक्ष की अवधारणा को स्वीकार किया गया है तथा मानव मुक्ति के मार्ग उल्लेखित किए गए हैं। जैन शब्द 'जिनÓ से बना है, जिसका अर्थ है-विजयी अर्थात जिसने राग-द्वेषादि शत्रुओं पर विजय पा ली हो। इसीलिए ऐसे व्यक्तित्व को 'वीतरागÓ भी कहा जाता है। कर्मबंधन की ग्रंथि खोल देने के कारण उन्हें 'निग्रंथÓ अथवा 'अर्हतÓ भी कहा जाता है। जीवन के इस चरमोत्कर्ष तक पहुंचने हेतु जैन साहित्य में दो विधियों का वर्णन है-संवर एवं निर्जरा।
कर्म के बंधन में एक बार बंध जाने पर कर्म-चक्र निरंतर चलता रहता है। कर्मफल गहराता जाता है और बंधन बढ़ता चला जाता है। एक कर्म से दूसरा, दूसरे से तीसरा, तीसरे से चौथा और इस प्रकार कर्म-प्रवाह अनवरत गतिमान रहता है। जब तक इसे कठोर प्रयासों से रोका न जाए, तब तक इस पर विराम नहीं लग पाता। जीव में प्रवेश करने वाले नवीन कर्मों के मार्ग को सर्वथा अवरुद्ध कर देना 'संवरÓ कहलाता है। कर्मों का प्रवेश द्वार एक बार बंद हो जाने से जीव में नए कर्म प्रविष्ट नहीं हो सकते। इसके पश्चात अगला सोपान 'निर्जराÓ का है, जिसमें पहले से आ चुके कर्मों को हटा देना व पूर्णत: समाप्त कर देना होता है। जब कर्मफल का अंतिम कण भी जीव से हटा दिया जाता है, तब वह अपने सर्वज्ञ रूप में प्रकाशित होता है। यही मोक्ष है। संवर व निर्जरा की यह प्रक्रिया अत्यंत तार्किक एवं व्यावहारिक है। इसे इस रूप में जान सकते हैं कि आंधी-तूफान आने पर घर में धूल व कूड़ा इक_ा हो जाता है। यदि हम सफाई करना चाहते हैं तो सर्वप्रथम हमें घर के खिड़की-दरवाजे बंद करने होंगे, ताकि और अधिक कचरा घर में प्रवेश न कर पाए। जब यह प्रवेश बंद हो जाएगा, तभी घर में आ चुकी गंदगी साफ हो पाएगी।