कर्नाटक में फिर भाजपा सरकार
   Date31-Jul-2019

दक्षिण के बड़े राज्य कर्नाटक में जन इच्छा के अनुरूप भाजपा की येदियुरप्पा की सरकार स्थापित हो गई है। विधानसभा अध्यक्ष के.आर. रमेश कुमार के कारण एक सप्ताह से अधिक समय तक राजनीतिक ड्रामा चलता रहा। उन्होंने 17 विधायकों को अयोग्य करार इसलिए दिया कि उन्होंने इस्तीफे दे दिए थे। चूंकि 105 सदस्यों के साथ भाजपा सबसे बड़ी पार्टी होने से 28 जुलाई को भाजपा के नेता येदियुरप्पा ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और 2 दिन में ही उन्होंने सदन में बहुमत सिद्ध कर दिया। भारत के 18 राज्यों में भाजपा की सरकार हो गई है। कर्नाटक की कुमार स्वामी सरकार बहुमत नहीं होने से 23 जुलाई को गिर गई थी। इसके बाद अध्यक्ष के अलावा सदन में विधायकों की संख्या 204 थी, बहुमत के लिए 103 सदस्यों का समर्थन जरूरी था, येदियुरप्पा ने 105 सदस्यों के समर्थन से विश्वास मत प्राप्त कर लिया। 225 सदस्यीय विधानसभा में 17 सदस्यों को अयोग्य घोषित कर अध्यक्ष के.आर. रमेश ने अपने अधिकारों के दुरुपयोग का रिकार्ड बनाया। कर्नाटक में कुमार स्वामी सरकार के पतन का नाटक जब प्रारंभ हुआ, जब कांग्रेस और जनता दल (एस) के 17 विधायकों ने सरकार से विद्रोह कर विधानसभा अध्यक्ष को अपने इस्तीफे सौंप दिए। इसके बाद ये सभी विधायक मुंबई की होटल में चले गए। इस्तीफे स्वीकार करने में विधानसभा अध्यक्ष टालमटोल करते रहे। बागी विधायकों ने सुप्रीम कोर्ट में दस्तक दी। कोर्ट ने कहा कि विधायकों को अविश्वास प्रस्ताव के समय सदन में उपस्थित रहने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। भाजपा के येदियुरप्पा ने अविश्वास प्रस्ताव प्रस्तुत किया और बहुमत नहीं होने से कुमार स्वामी सरकार की अकाल मृत्यु हो गई। लोकसभा चुनाव में कर्नाटक में भी भाजपा की जीत दर्ज हुई। हालत यह हुई कि जद(एस) के वरिष्ठ नेता और पूर्व प्रधानमंत्री देवेगौड़ा भी पराजित हो गए। विडंबना यह है कि देवेगौड़ा की केन्द्र सरकार भी करीब सवा वर्ष तक चल सकी थी। कांग्रेस के कारण देवेगौड़ा सरकार का पतन हो गया था। इसी तरह के पटकथा देवेगौड़ा के पुत्र कुमार स्वामी की सरकार की रही। कर्नाटक सरकार के घटनाक्रम से यह तो जाहिर हो गया कि गठबंधन सरकार तभी स्थिर रह सकती है, जब राष्ट्रीय दल के नेतृत्व में सरकार बने। कर्नाटक में जनता की पहली पसंद की पार्टी भाजपा है। दूसरे क्रमांक पर कांग्रेस और तीसरे क्रमांक पर जद(एस)। कांग्रेस ने भाजपा को सरकार से बाहर रखने के लिए जद(एस) के साथ कुमार स्वामी की सरकार बनी। बेचारे कुमार स्वामी कांग्रेस के दबाव में काम करने के कारण इतने परेशान थे कि कई बार उनके आँखों से आंसू टपक पड़े। कांग्रेस और जद(एस) विधायकों की बगावत के कारण कांग्रेस अल्पमत में आ गई। इससे यह जाहिर हो गया कि राष्ट्रीय दल की बैसाखी पर टिकी सरकार का कोई भविष्य नहीं रहता।
दृष्टिकोण
35(ए) का हटना तय
इन दिनों कश्मीर घाटी में अतिरिक्त सुरक्षा बल का जमावड़ा होने से यह चर्चा चल रही है कि केन्द्र सरकार अस्थाई धारा 370 एवं 35(ए) को हटा रही है। सच्चाई का पता लगाने के पूर्व ही पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने कहा कि यदि इन धाराओं को हटाया गया तो कश्मीर में आग लग जाएगी। उन्होंने कहा कि भय का माहौल है, उन्होंने सर्वदलीय बैठक बुलाकर केन्द्र सरकार का मुकाबला करने की मांग की है। हालांकि केन्द्र सरकार की ओर से 35(ए) को हटाने के बारे में अपनी स्थिति स्पष्ट नहीं की है। इस बारे में श्रीनगर के एसएसपी का एक पत्र वायरल हुआ है, इसमें उन्होंने अपने पांच झोनल एसपी को अपने-अपने क्षेत्र की मस्जिदों और उनके प्रबंध कमेटियों की पूरी जानकारी उपलब्ध कराने को कहा है। इससे कश्मीर के नेता परेशान और केन्द्र के खिलाफ एकजुट होने की बात कर रहे हैं। पूर्व मुख्यमंत्री फारुख अब्दुल्ला ने कहा है कि वे इस बारे में प्रधानमंत्री से चर्चा करना चाहते हैं। चाहे सच्चाई कुछ भी हो, लेकिन भाजपा के संकल्प पत्र और सैद्धांतिक एजेंडे में जम्मू-कश्मीर से अस्थाई धारा 370 को हटाने की बात कही गई है। जनसंघ के समय से ही इस धारा को हटाने की मांग की गई है। डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने भी कश्मीर की अलग पहचान बताने वाली अस्थाई धारा 370 को हटाने को लेकर सत्याग्रह किया था। भारत की एकता, अखंडता के लिए भी यह जरूरी है कि अलगाव की स्थिति पैदा करने वाले प्रावधानों को हटाया जाए। कश्मीर में अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार के पास ही सत्ता की बागडोर रही है। परिवारवादी राजनीति के कारण कश्मीर की प्रगति भी नहीं हो सकी।