पौधारोपण से संभव धरती के विनाश पर रोक
   Date31-Jul-2019

धर्मधारा
य दि हम सब यह चाहते हैं कि हमारी यह धरती, इस पर निवास करने वाला प्राणी जगत सुरक्षित रहे, तो हमें पेड़-पौधों की रक्षा और उनके नवरोपण सुरक्षादि की ओर विशेष ध्यान देना होगा। हम चाहे हैं कि यह धरती हरी-भरी रहे, नदियां अमृत जल बहाती रहे और मानवता की सुरक्षा होती रहे तो पेड़-पौधे उगाने, लगाने, संवद्र्धित करने और संरक्षित करने का एक अभियान चलाना होगा। प्रकृति की शोभा वृक्षों से है। वृक्षों से इस धरा का जो रूप निखरता है, वह मानव को प्रेरित करता है। पेड़-पौधे प्रकृति की सुकुमार, सुन्दर और सुखदायक संताने है। जिनके माध्यम से प्रकृति अपने अन्य पुत्रों, मनुष्यों तथा अन्य सभी तरह के जीवों पर अपनी ममता के भंडार न्यौछावर कर अनन्त उपकार युगो-युगो से करती आ रही है। स्वयं पेड़-पौधे भी अपनी प्रकृति माँ की तरह ही सभी जीव-जंतुओं पर उपकार तो किया ही करते हैं तथा उनके सभी तरह के अभावों को दूर करने के अप्रतिम साधन भी है। पेड़-पौधे और वनस्पतियां धरतीवासियों को फल-फूल, औषधियां, छाया एवं अनंत विश्राम तो प्रदान किया ही करते हैं, वे प्राण-वायु (ऑक्सीजन) के अक्षय भंडार भी है। जिसके अभाव में किसी भी प्राणी का एक पल के लिए भी जीवित रह पाना संभव नहीं है। यह निर्विवाद सत्य है कि पौधारोपण की आवश्यकता इस धरती पर आदि काल से रही है। बड़े-बड़े ऋषि-मुनियों के आश्रमों में वृक्षों की सघनता पहली आवश्यकता होती थी। महाकवि कालिदास ने अभिज्ञान शाकुंतलम् के अन्तर्गत महर्षि कण्व के शिष्यों के द्वारा पौधारोपण किए जाने का उल्लेख किया है। ऋषि-मुनियों की खोज पौधारोपण के पीछे सब प्राणियों के प्रति स्वास्थ्य की रक्षा अहम रही है। पौधारोपण से हमारे जीवन प्रकृति का परस्पर संतुलन क्रम बना रहता है, यह बात ऋषि-मुनियों ने जगत को समझाया और शाों में भी वृक्षों की महिमा अंकित है। (क्रमश:)