आतंकवाद के उन्मूलन में कठोर कानूनों की दरकार
   Date31-Jul-2019

नीरज कुमार दुबे
मो दी सरकार आने के बाद देश में आतंकवाद और उग्रवाद के मामलों में कमी आई है। नक्सलवाद भी केवल 60 जिलों तक सीमित रह गया है। यही कारण रहा कि हालिया लोकसभा चुनावों में देश की जनता ने राष्ट्रीय सुरक्षा के मोर्चे पर मोदी सरकार को पूरे अंक दिये। नरेंद्र मोदी सरकार आतंकवाद को जड़ से उखाडऩे की दिशा में अपने पहले ही कार्यकाल से प्रतिबद्ध दिखी और यही कारण रहा कि 2014 से पहले जहाँ देश में आतंकवादी घटनाओं का बोलबाला रहता था वहीं मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से सरकार की आतंकवाद के प्रति कठोर नीति का असर दिखा। जम्मू-कश्मीर को अपवाद मानें तो मोदी सरकार के शासन में देश आतंकवाद की घटनाओं से लगभग मुक्त रहा और सीमा पार आतंकवाद को भी लगातार मुँहतोड़ जवाब दिया गया। पिछले पांच साल के आंकड़े देखें तो मोदी सरकार के आने के बाद देश में आतंकवाद और उग्रवाद के मामलों में कमी आई है। नक्सलवाद भी केवल 60 जिलों तक सीमित रह गया है। यही कारण रहा कि हालिया लोकसभा चुनावों में देश की जनता ने राष्ट्रीय सुरक्षा के मोर्चे पर मोदी सरकार को पूरे अंक दिये और उसे 303 सीटों के साथ देश की सत्ता दोबारा सौंप दी। नरेंद्र मोदी ने दोबारा सत्ता में आते ही संकेत दिये कि सरकार आतंकवाद और उसके पनाहगारों का पूरी तरह सफाया करने और जांच एजेंसियों को और ताकत देने के काम को आगे बढ़ायेगी। हाल ही में कुछ ऐसे कदम उठाये गये जिससे साफ हो गया कि मोदी सरकार देश को बाह्य और आंतरिक मोर्चों पर एकदम सुरक्षित कर देश के विकास की ओर ही ध्यान देने के प्रति कृतसंकल्प नजर आ रही है। इस दिशा में हालिया बड़े कदमों में राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) से संबंधित विधेयक में संशोधन करके इसको जो अधिक अधिकार दिये गये हैं या फिर विधि विरूद्ध क्रियाकलाप निवारण संशोधन विधेयक 2019 (्रक्क्र) को जो मंजूरी प्रदान की गयी है उसका उद्देश्य और भाव समझना चाहिए। आतंकवाद को जड़ से उखाडऩे के लिए देश में कठोर से कठोर कानून की जरूरत है और ्रक्क्र कानून में संशोधन देश की सुरक्षा में लगी जांच एजेंसी को मजबूती प्रदान करने के साथ ही आतंकवादियों से हमारी एजेंसियों को चार कदम आगे रखेगा। कांग्रेस आज एनआईए को और अधिकार देने तथा ्रक्क्र में लाये गये संशोधनों का विरोध कर रही है तो यह कोई नयी बात नहीं है क्योंकि आतंकवाद के प्रति उसकी नरम नीति बरसों पुरानी है और इसका खामियाजा इस देश ने बरसों तक भुगता है। जरा सन् 2004 को याद कीजिये। केंद्र में मनमोहन सिंह के नेतृत्व में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार बनते ही जो काम पहले किये गये थे उनमें आतंकवाद निरोधक कानून पोटा को हटाना था। अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार ने संसद के दोनों सदनों की बैठक बुलाकर इस कानून को पास कराया था और इस कानून को खत्म करने का चुनावी वादा कांग्रेस ने किया था इसलिए मनमोहन सिंह के सत्ता में आते ही पोटा कानून को खत्म कर दिया गया। लेकिन इससे हुआ क्या? आतंकवादियों के हौसले बुलंद हुए। जम्मू-कश्मीर, पंजाब, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, कर्नाटक, तमिलनाडु आदि राज्यों के अलावा राजधानी दिल्ली तक अलग-अलग समयों पर विस्फोटों से दहली। आतंकवादियों के स्लीपर सेलों ने देश के विभिन्न राज्यों में अपने पाँव फैला लिये थे, केरल में चरमपंथी संगठनों का प्रभाव बढ़ता जा रहा था और मनमोहन सिंह की सरकार हाथ पर हाथ धरे बैठी नजर आ रही थी।
24 अक्टूबर 2001 को तत्कालीन केन्द्र सरकार द्वारा लाया गया आतंकवाद निरोधक कानून पोटा इन उम्मीदों के साथ लाया गया था कि आतंक के साये में रह रहे घाटी के लोगों के साथ ही यह समूचे देशवासियों को भी राहत दिलाएगा। जो कांग्रेस 1985 में टाडा जैसे कानून को लागू कर चुकी थी वह पोटा को लेकर आक्रामक मुद्रा में आ गई और इसे पारित नहीं होने देने का हर संभव प्रयास किया लेकिन अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने संसद का संयुक्त सत्र बुलाकर इसे पारित करा लिया। कांग्रेस चूँकि तुष्टिकरण की राजनीति करती रही है इसलिए उसने आतंकवाद पर चोट करने के प्रयासों का सदैव विरोध किया। यही नहीं जो टाडा कानून उसने बनाया था उसे भी अपनी मौत मर जाने दिया। दरअसल मई 1985 में टाडा अधिनियम बनाया गया था और यह कानून मई 1995 तक लागू रहा और फिर इसकी अवधि समाप्त होने पर इसे खत्म हो जाने दिया गया। कांग्रेस को चूँकि 1996 के लोकसभा चुनावों का सामना करना था, इसलिए उसने टाडा कानून को अपनी मौत मर जाने दिया। टाडा कानून अपने कथित दुरुपयोग को लेकर काफी बदनाम रहा। कांग्रेस ने पोटा कानून जिस समय खत्म किया था उस समय देश में 'यूएसए-पैट्रियोट एक्टÓ जैसे सख्त कानून की जरूरत थी जोकि 11 सितंबर की घटना के बाद अमेरिकी प्रशासन ने 26 अक्टूबर 2001 को बनाया था। इसका असर भी देखने को मिला, भले ही अमेरिका के आतंकवादियों के निशाने पर होने की कितनी ही खबरें आती हों लेकिन अमेरिका में 11 सितम्बर जैसी बड़ी घटना की हिमाकत करने की बात सोचना भी अब मुश्किल है। यही नहीं लंदन में 7 जुलाई 2005 को हुए आतंकवादी हमलों के बाद ब्रिटेन ने भी 30 मार्च 2006 को सख्त कानून 'टेररिज्म एक्ट-2006Ó बनाया। 2007 के कार बम हमलों को छोड़ दें तो ब्रिटेन में आतंकवादी घटनाओं की इक्का-दुक्का वारदातें ही सामने आई हैं।
फिलीपीन्स ने भी आतंकवाद की वैश्विक और क्षेत्रीय स्तर पर मिल रही चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए फरवरी 2007 में सख्त आतंकवाद निरोधक कानून बनाया जिसे 'ह्यूमन सिक्योरिटी एक्ट ऑफ 2007Ó के नाम से जाना जाता है। इसके अलावा आस्ट्रेलिया में सत्तापक्ष और विपक्ष ने 2004 में आपस में सहयोग कर आतंकवाद निरोधी कानून बनाया। लेकिन अपने यहां कुछ राजनीतिक दलों को आतंकवाद से खतरा नहीं बल्कि अपने वोट बैंक के नाराज होने का खतरा ज्यादा रहता है। याद कीजिये तत्कालीन प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह और तत्कालीन गृहमंत्री शिवराज पाटिल के वह बयान जोकि उन्होंने हर आतंकवादी घटना के बाद दोहराये। उन बयानों में बड़ी बेबसी-सी नजर आती थी।
आपको जनवरी 2009 का एक वाकया याद दिलाते हैं। तत्कालीन गृहमंत्री पी. चिदम्बरम, जिन्होंने अपना पद संभालते ही जिस तेजी के साथ राष्ट्रीय जांच एजेंसी और आतंकवाद के खिलाफ कड़ा कानून संसद से पारित कराकर यह संदेश देने का प्रयास किया था कि आतंकवाद की अब खैर नहीं। उन्होंने उक्त कार्यों को हुये महीना भर भी नहीं गुजरा कि कह दिया कि आतंकवाद के खिलाफ कड़े कानून के प्रावधानों पर पुनर्विचार के लिए वह तैयार हैं। उन्होंने यह बयान देकर सही नहीं किया क्योंकि इससे देश के सॉफ्ट स्टेट होने की धारणा एक बार फिर बलवती हुई थी। 2009 में तत्कालीन मंत्रिमंडल आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई को लेकर एकराय नहीं था यह बात तब साबित हो गयी थी जब तत्कालीन विदेश मंत्री प्रणब मुखर्जी ने मुंबई हमला मामले में कहा था कि भारत ने अपनी ओर से पाकिस्तान को सबूत पेश कर दिये हैं और उसके जवाब का इंतजार करने के अलावा और कोई विकल्प नहीं है जबकि तत्कालीन रक्षा मंत्री तब कह रहे थे कि भारत के पास सभी विकल्प खुले हैं। 2009 ही वह वर्ष था जब पहली बार अमेरिका ने माना था कि भारत विश्व के सर्वाधिक आतंकवाद प्रभावित देशों में से एक है। हालांकि इसके साथ ही अमेरिका ने आतंकवाद के खिलाफ भारत के अभियान की धीमी प्रक्रिया पर भी चिंता जताई थी। अमेरिकी विदेश विभाग की वार्षिक 'कंट्री रिपोर्ट्स ऑन टेरेरिज्म-2008Ó में कहा गया था कि मुंबई और देश भर में हुए ऐसे ही हमले बताते हैं कि आतंकियों को चंदे में मोटी रकम मिल रही है और वे आर्थिक रूप से बहुत समृद्ध हैं।