सरलता
   Date03-Jul-2019

प्रेरणादीप
ए क बार पं. दीनदयाल जी मुजफ्फरपुर से मोतीहार जा रहे थे, जिस रेल के डिब्बे में पंडितजी बैठे थे, उसी डिब्बे में जिले के एक उच्च अधिकारी भी यात्रा कर रहे थे। एक स्टेशन पर डिब्बे में जूतों पर पॉलिश करने वाला एक लड़का आया और इशारा पाकर वह उपाध्याय जी के जूते उठाकर पॉलिश करने लगा। उपाध्यायजी अखबार पढऩे में व्यस्त हो गए। पॉलिश करने के बाद उस लड़के ने अधिकारी महोदय से भी कहा - साहब पॉलिश। साहब ने पूछा, कपड़ा है साफ करने का? लडऩे ने दीनता से कहा, नहीं। साहब ने कहा, तब जाओ। उपाध्यायजी से पैसे लेकर लड़का जाने लगा। उसके चेहरे पर बेबसी की छाया देखकर उपाध्यायजी ने उसे रोकते हुए कहा, बच्चे, साहब के जूतों पर भी पालिश करो। उसी समय उपाध्यायजी ने अपने झोले से पुराना सा तौलिया निकालकर उसका एक टुकड़ा फाड़कर बच्चे को देते हुए कहा लो, यह कपड़ा लो। ठीक से रखना। देखो, इसके बिना तुम्हारा नुकसान हो गया था। लड़के ने खुश होकर साहब के जूते पॉलिश किए। अब वह अधिकारी दीनदयालजी की ओर आश्चर्य से देख रहा था कि स्टेशन आ गया। गाड़ी रुकते ही दीनदयाल उपाध्याय जिन्दाबाद के नारे लगाते हुए कार्यकर्ताओं की भीड़ डिब्बे के सामने पहुंच गई। वह अधिकारी यह देखकर अवाक रह गए।