संसद में नेहरू इतिहास के कठघरे में
   Date03-Jul-2019

चाहे लोकसभा में भाजपा को प्रचंड बहुमत मिला हो, लेकिन राज्यसभा में बहुमत नहीं होने से मोदी सरकार के महत्व के विधेयक पारित होना संभव नहीं है, लेकिन चुनाव में करारी हार से कांग्रेस और विपक्षी दल अपने बचाव की तलाश कर रहे हैं। गृहमंत्री अमित शाह ने लोकसभा में पारित होने के बाद जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति शासन की अवधि छह माह बढ़ाने और सीमा क्षेत्र के लोगों को आरक्षण देने संबंधी विधेयक राज्यसभा में भी पारित हो गए, अब इन पर राष्ट्रपति की स्वीकृति की मोहर लगकर लागू हो जाएंगे। इस मामले में गृहमंत्री अमित शाह की रणनीति और सूझबूझ से सफल रही भाजपा को दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी बनाने और कुशल चुनावी रणनीति से भाजपा को प्रचंड बहुमत दिलाने के बाद उन्हें गृहमंत्री नियुक्त किया गया, चुनौती का सामना करते हुए और सफलता के कीर्तिमान स्थापित करने वाले अमित शाह ने गृहमंत्री बनने के बाद आंतरिक सुरक्षा और जम्मू-कश्मीर के लिए जो नीतिगत निर्णय लिए और प्रधानमंत्री की तरह ही अपने दायित्व को निष्ठा के साथ निभाने के लिए अपना जीवन खपा रहे है, लोकसभा में जम्मू-कश्मीर के संबंध में विधेयक प्रस्तुत करते हुए जो भाषण दिया और इतिहास के पृष्ठों को पलटते हुए कश्मीर समस्या के लिए जिस दृढ़ता के साथ उन्होंने प्रथम प्रधानमंत्री पं. नेहरू को जिम्मेदार ठहराया उससे ऐसा लगा कि गृहमंत्री अमित शाह धारा 370 की समाप्ति की ओर तेजी से बढ़ रहे है। विश्वास हुआ है कि आतंकवाद भी समाप्त होगा और कश्मीर में भी शांति स्थापित होगी। राज्यसभा में भी दोनों बिल प्रस्तुत करते हुए अमित शाह ने कहा कि 1949 में जब भारतीय सेना हमलावर पाकिस्तान की कबाइली सेना को खदेड़ रही तो बीच में पं. नेहरू ने सीज फायर का आदेश देकर सेना के बढ़ते कदम रोक दिया और कश्मीर के एक तिहाई भाग पर पाकिस्तान काबिज हो गया। पं. नेहरू की गलत नीतियों से ही आतंकवाद की समस्या पैदा हुई और कश्मीर घाटी का स्वर्ग हिंसा की आग में जलने लगा। आश्चर्य यह कि तृणमूल और सपा सदस्यों के साथ बिजू जनता दल ने भी इन दोनों विधेयक के समर्थन में आने से सर्वसम्मति से राज्यसभा में भी दोनों विधेयक पारित हो गए। अमित शाह ने मोदी सरकार की जम्मू-कश्मीर संबंधी नीति प्रस्तुत करते हुए कहा कि वह दिन दूर नहीं, जब अत्याचारों से पीडि़त होकर कश्मीर से पलायन करने वाले कश्मीरी पंडित वापिस आकर निडर होकर मंदिर में पूजा करते दिखाई देंगे। उन्होंने स्पष्ट कहा कि जिस तरह आतंकियों के खिलाफ जीरो टॉलरेंस है, उसी तरह अलगाववादियों के खिलाफ भी कार्यवाही की जा रही है। देश तोडऩे वाले टुकड़े-टुकड़े गैंग को भी उन्हीं की भाषा में जवाब दिया जाएगा। पहली बार जम्मू-कश्मीर समस्या की जड़ पर प्रहार करते हुए कांग्रेस पार्टी को भी उसके देश विरोधी इतिहास से परिचय करा दिया।
दृष्टिकोण
सवाल कांग्रेस के भविष्य का ?
जब कांग्रेस की राहुल गांधी के नेतृत्व में करारी पराजय की चर्चा होती है तो कांग्रेस की ओर से कहा जाता है कि ऐसी पराजय तो भाजपा की भी हुई थी। उसके केवल दो सदस्य जीत सके थे, यह उलट फेर तो चलता रहता है। यह सही है कि राजीव गांधी को इंदिराजी की हत्या के बाद सहानुभूति लहर में जो चुनाव हुए उसमें भाजपा के केवल दो सदस्य जीत सके थे, जो दक्षिण भारत के थे, लेकिन इसके बाद अटलजी और आडवाणी के नेतृत्व में भाजपा फिर अपने विचारों के साथ उठ खड़ी हुई। विचार ही किसी पार्टी की प्राण वायु होती है। कांग्रेस की दुर्गति से कांग्रेस नेतृत्व सदमे में है। राहुल गांधी इस्तीफा देने के निर्णय पर अड़े हुए है। परिक्रमा लगाने वाले राग दरबारी के अध्यक्ष पद पर बने रहने की मान मनोब्बल कर रहे हैं, कोई अनशन कर रहा है, दर्जनों पदाधिकारियों ने अपने पदों से त्याग पत्र दे दिए है। म.प्र., राजस्थान, पंजाब के मुख्यमंत्री भी राहुल गांधी को मनाने पहुंचे, लेकिन राहुल अपने निर्णय पर अड़े हुए है। राजनीतिक पंडित और कांग्रेस विरोधी कह रहे हैं कि कांग्रेस में जो चल रहा है, वह केवल ड्रामा है। यह भी कहा जा रहा है कि वैकल्पिक अध्यक्ष की तलाश की जा रही है, सूत्र बताते हैं कि पूर्व मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और अनुसूचित जाति के चेहरे सुशील कुमार शिन्दे को अध्यक्ष बनाया जा सकता है। यदि कोई अध्यक्ष बन भी गया तो भी सोनिया-राहुल के रिमोट कंट्रोल से ही कांग्रेस संचालित होगी। जिस तरह दस वर्षों तक मनमोहन सरकार रिमोट कंट्रोल से चली, उसी तरह कांग्रेस भी चलेगी। सोनिया-राहुल के दरबारी रहकर अध्यक्ष को काम करना होगा। यह भी सही है कि सोनिया-राहुल-वाड्रा परिवार के बिना कांग्रेस का जीवन संभव नहीं है।
कांग्रेस की वैचारिक दिशा और दृढ़ता से आगे बढऩे की शक्ति का भी क्षरण हो गया है, ऐसी