शब्द की महत्ता
   Date23-Jul-2019

स्वा मी विवेकानंद एक सत्संग में भगवान के नाम की महत्ता बता रहे थे कि वहां उपस्थित एक तार्किक ने प्रश्न किया- 'शब्दों में क्या रखा है और उन्हें रटने से क्या लाभ?Ó विवेकानंद ने उत्तर में उसे कतिपय अपशब्द कहे- 'मूर्ख, जाहिल आदि।Ó इस पर वह तार्किक आगबबूला हो गया और भन्नाते हुए कहा- 'आप संन्यासी के मुंह से ऐसे शब्द शोभा नहीं देते। उन्हें सुनकर मुझे बहुत चोट लगी है।Ó इस पर स्वामी जी ने हंसते हुए कहा- 'भाई! वे तो शब्द मात्र थे। शब्दों में क्या रखा है। मैंने कोई पत्थर तो नहीं मारा।Ó इससे उसके साथ ही सुनने वालों तक का भी समाधान हो गया। शब्द जब किसी को क्रोध उत्पन्न कर सकते हैं तो जिसके लिए प्रिय शब्द भावपूर्वक कहे जाएंगे तो उसका अनुग्रह वे क्यों आकर्षित न करेंगे?