ईश्वरत्व की प्राप्ति के साधन कर्तव्य और सदाचार
   Date23-Jul-2019

कै से करूं ईश-आराधन? कैसे करूं प्रभु की सेवा? कैसे करूं प्रभु की पूजा? कैसे मनाऊं अपने प्रभु को? कैसे रिझाऊं अपने आराध्य को? कैसे और कब होंगे भगवान मुझ पर प्रसन्न? आदि प्रश्न अक्सर अध्यात्म पथ के पथिकों के मन में आते ही रहते हैं। ऐसा होना स्वाभाविक है, क्योंकि हर कोई जीवन में आनंद चाहता है, प्रेम चाहता है, कृपा चाहता है। इसलिए हर कोई विधि-विधानपूर्वक ईश्वर की उपासना करता है, उनका अभिनंदन करता है, पूजन करता है, अर्चन करता है, वंदन करता है और व्रत और उपवास करता है।
इतना करने के बाद भी अभीष्ट फल की प्राप्ति न हो तो? ईश्वर की कृपा प्राप्त न हो पाए तो? तो फिर हम निश्चित ही हताश हो जाते हैं, निराश हो जाते हैं, नास्तिक हो जाते हैं और फिर ईश्वर ही नहीं स्वयं पर से भी हमारा विश्वास उठ-सा जाता है। तब क्या ईश्वर पूजन, वंदन, अर्चन का कोई मोल नहीं? विधि-विधानपूर्वक की गई ईश्वर की पूजा, उपासना का कोई महत्व नहीं? नहीं अवश्य ही ऐसा नहीं है। इन सबका मोल है, महत्व है, पर जो चीज सबसे महत्वपूर्ण है वह यह है कि पूजा-उपासना के साथ-साथ हमारा जीवन कैसा है? हमारा चिंतन, चरित्र और व्यवहार कैसा है? व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र, विश्व आदि के प्रति हमारा नजरिया कैसा है? ईश्वर के प्रति हमारी मान्यता कैसी है? हम पूजा राम की करें और काम रावण सरीखे करें, हम भक्ति कृष्ण की करें और कर्म कंस की तरह करें तो फिर यह कैसी भक्ति है? कैसी पूजा है? कैसी उपासना है। यह ऐसी पूजा-उपासना, चिह्न पूजा से क्या लाभ? यदि हम सचमुच ईश्वर-उपासक हैं तो हममें करुणा, प्रेम, सत्य, न्याय, पवित्रता आदि विशेषताएं अवश्य ही प्रकट होनी चाहिए। हम ईश्वर की स्तुति, चालीसा, आरती करते हुए भगवान की इन्हीं विशषताओं, आदर्शों तथा सद्गुणों का बार-बार स्मरण भी तो इसलिए करते हैं कि वे विशेषताएं हम भी स्वयं के जीवन में धारण कर सकें और सदैव ईश्वर के बताए मार्ग पर चलते रहें। आवश्यकता ईश्वर को प्रसन्न करने की नहीं, वरन् उनकी विशेषताओं को धारण कर उसी मार्ग पर चल पडऩे की है, क्योंकि करुणासिंधु भगवान हमसे अप्रसन्न ही कब थे कि उन्हें प्रसन्न करना है। यदि हमें सचमुच ईश्वर की कृपा प्राप्त करनी है तो हमें सदाचारी व कर्तव्य परायण होना ही चाहिए। परमेश्वर का प्रेम केवल सदाचारी व कर्तव्य परायण लोगों के लिए सुरक्षित है।