सुरक्षित सीमा की पहल...
   Date02-Jul-2019

देश की सीमाएं अगर सुरक्षित होंगी तो देश में न केवल शांति रहेगी, बल्कि विकास के साथ ही आर्थिक प्रगति के द्वार भी निरंतर खुलते चले जाएंगे... बांग्लादेश, पाकिस्तान, नेपाल, श्रीलंका की सीमा से भारत में अवैध घुसपैठ एवं नकली नोट से लेकर नशीली वस्तुओं की खेप भेजने का काम दशकों से चल रहा है... बांग्लादेश की सीमा को कंटीले तारों की दीवार बनाकर रोका जा रहा है, तो अन्य देशों की सीमाओं पर भी भारत ने सख्त पहरा करके अवैध घुसपैठ एवं आतंकवादी हरकतों का मुंहतोड़ जवाब देने की रणनीति पर निरंतर काम जारी रखा है... आतंकवाद के खिलाफ भारत सरकार की 'जीरो टॉलरेंसÓ का असर भी दिखने लगा है... बस भारत सरकार और भारतीय सेना को अपना जज्बा बनाए रखना होगा, ताकि नापाक ताकतें विफल हो सके...
अंतर्राष्ट्रीय सीमा पर रहने वाले नागरिकों के सामान्य जीवन के लिए जितने भी कदम उठाए जाएं, सबका स्वागत और सच्चा क्रियान्वयन होना चाहिए... जम्मू-कश्मीर आरक्षण संशोधन अधिनियम 2019 का लोकसभा में पेश होना नई केंद्र सरकार के नए गृहमंत्री अमित शाह द्वारा उठाया गया पहला सकारात्मक कदम है... जम्मू-कश्मीर की सरकार ने वर्ष 2004 में इसके लिए पहला कानून बनाया था, जिसके तहत वास्तविक नियंत्रण रेखा पर रहने वालों के लिए तीन प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान किया गया था... इसे व्यवस्था की कमी ही कहा जाएगा कि अंतर्राष्ट्रीय सीमा के करीब रहने वाले लाखों जरूरतमंद इस आरक्षण से वंचित रह गए थे... जम्मू और कठुआ में जो सीमावर्ती इलाके हैं, वहां लोग आए दिन तनाव और गोलीबारी झेलते हैं... उनके जीवन का एक बड़ा हिस्सा छिपते-भागते, बंकरों में बीत जाता है... ऐसे लोगों को आरक्षण का लाभ देना न केवल प्रशासकीय-शासकीय अनिवार्यता है, बल्कि मानवीय दृष्टि से भी यह प्रशंसनीय कदम है... देश की सीमाओं पर परोक्ष रूप से कवच का काम करने वाले लोगों को आरक्षण के अतिरिक्त भी अनेक प्रकार से समर्थन और संबल प्रदान करना चाहिए... यह पाकिस्तान के सैन्य कमांडरों की फौरी सनक के सामने दमखम से खड़े होने के लिए ही नहीं, बल्कि आतंकवादियों से लडऩे और घुसपैठ रोकने के लिए भी जरूरी है...
समग्र भारतीय राजनीतिक समाज भी आरक्षण की इस भावना के पूर्ण समर्थन में है और इसके विस्तार की मांग हो रही है... अनुमान है कि पहले तीन से चार लाख लोगों को ही इस आरक्षण का लाभ मिल रहा था, लेकिन अब दस लाख से अधिक लोग इसके दावेदार हो जाएंगे... अत: यह भी जरूरी है कि इस वर्ग के लिए तय तीन प्रतिशत आरक्षण सीमा को बढ़ाया जाए... साथ ही, इस श्रेणी में आरक्षण देते समय जातियों, संप्रदायों के बीच कोई भेद न किया जाए... जो भी सीमा पर रहने की कीमत चुका रहा है, उसे उसका यथोचित प्रतिफल मिलना ही चाहिए...
केंद्र सरकार इस विधेयक को पेश करने के साथ ही जम्मू-कश्मीर में राज्यपाल-राष्ट्रपति शासन को छह महीने के लिए बढ़ाना चाहती है... अत: छह महीने बाद जम्मू-कश्मीर में जो भी सरकार चुनकर आए, उसके लिए यह कर्तव्य होना चाहिए कि वह जम्मू-कश्मीर आरक्षण संशोधन विधेयक 2019 को और विस्तार दे.., ताकि सीमा पर रहने वाले ज्यादा से ज्यादा लोगों को लाभ मिल सके... अभी चूंकि कमान केंद्र सरकार के पास है, इसलिए केंद्र सरकार को भी बजट और अन्य माध्यमों से जम्मू-कश्मीर के लोगों को यह संकेत देना होगा कि वहां केवल आरक्षित वर्ग का विस्तार ही नहीं किया गया है, वहां रोजगार में भी वृद्धि की गई है... सीमावर्ती इलाकों में रोजगार बढ़ाना जरूरी है, ताकि उन्हें नौकरी के लिए ज्यादा दूर न जाना पड़े... नए कानून में आरक्षण के तहत नियुक्त लोगों के लिए सीमा के करीब ही कम से कम सात वर्ष सेवा देने की बाध्यता रखी गई है... ऐसे प्रावधान देश की दूसरी सीमाओं के लिए भी होने चाहिए... सीमा पर रहने वालों को यह एहसास हर पल होना चाहिए कि देश उनके पीछे खड़ा है... कोई संदेह नहीं, सीमा पर रहने वाले लोग जितने सशक्त होंगे, हमारी सीमाएं भी उतनी ही अलंघ्य होंगी... नए गृहमंत्री अमित शाह ने अपने दो दिन के जम्मू-कश्मीर प्रवास के बाद संसद में जिस तरह से वहां के वाशिदों के लिए आरक्षण व्यवस्था संबंधी बयान दिया एवं अमरनाथ यात्रा के सुरक्षित शुभारंभ की व्यापक रणनीति की घाटी में बैठकर ही समीक्षा की और दिशा-निर्देश जारी किए... इससे इतना तो तय हो गया है कि जम्मू-कश्मीर में नई सरकार के पूर्व तक केन्द्र सरकार विशेष रूप से गृहमंत्री अमित शाह आतंकवाद पर पूर्ण नकेल का मन बना चुके है... यही नहीं आतंकवाद के खिलाफ अभियान के साथ ही राज्य में विकास एवं सबको साथ लेने की नीतियां भी चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ रही है... यह सुरक्षित जम्मू-कश्मीर के हित में है...