कश्मीर समस्या के लिए जिम्मेदार हंै पं. नेहरू
   Date02-Jul-2019

जयकृष्ण गौड़
भा रतीय राष्ट्रवादी नीतियों की प्रखरता जहां एक ओर संसद में दिखाई दे रही है। गृहमंत्री अमित शाह ने कश्मीर के दौरे के बाद लोकसभा में जम्मू-कश्मीर में छह माह के लिए राष्ट्रपति शासन जारी रखने के विधेयक पर बोलते हुए कहा कि हम आतंकवाद के खिलाफ जीरो टॉलरेशन की नीति जारी रखेंगे, इसके साथ ही अलगावदियों, टुकड़े-टुकड़े गैंग को भी बर्दाश्त नहीं करेंगे। उन्होंने स्पष्ट कहा कि हुर्रियत और अलगाववादियों को विशेष सुरक्षा मुहैया नहीं कराई जाएगी। मोदी सरकार ने गिलानी आदि अलगाववादी नेताओं को विशेष सुरक्षा जो कांग्रेस सरकारों ने दी थी, उसे वापस ले ली गई है। इसी प्रकार पाकिस्तान और हवाला के माध्यम से पैसा अलगाववादियों को मिलता था, उसकी जांच एनआईए कर रही है। पहले कश्मीर की जेल में इन देशद्रोहियों को ऐशो आराम मिलता था, अब उनको दिल्ली एवं अन्य स्थानों की जेलों से भेजा जा रहा है। पत्थरबाजों को पैसा मिलना बंद हुआ तो सुरक्षा बलों पर पथराव की घटनाएं भी कम हुई है। कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने जब कश्मीर के लोगों को विश्वास लेने की बात करते हुए समस्या के इतिहास का उल्लेख किया तो अमित शाह ने 1947 तक के इतिहास की सच्चाई व्यक्त करते हुए कहा कि कश्मीर समस्या देश का मजहबी आधार पर विभाजन के कारण हुई, उन्होंने कांग्रेस पर गरजते हुए सवाल किया कि देश विभाजन की स्वीकृति किसने दी? जब कबाइलियों के वेश में कश्मीर पर हमला हुआ तो भारतीय सेना विमान के द्वारा श्रीनगर पहुंची और सेना ने कबाइली सेना को खदेडऩा प्रारंभ किया। उस समय जम्मू-कश्मीर के राजा हरिसिंह ने भारत में राज्य विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए थे। इस घटनाक्रम की पूरी सच्चाई काफी लोगों को ज्ञात नहीं है। राजा हरिसिंह ने भारत संघ की सभी रियासतों के भारत में विलय के बाद भी जम्मू-कश्मीर के भारत में विलय पत्र पर हस्ताक्षर बाद में किए। इसके पीछे के कारणों को जानना होगा। राजा हरिसिंह और पं. नेहरू के संबंध ठीक नहीं थे। शेख अब्दुल्ला को कश्मीर के अधिकार देने की तैयारी पं. नेहरू कर चुके थे। पं. नेहरू के प्रधानमंत्री रहते अपनी रियासत का विलय भारत संघ में करने को वे तैयार नहीं थे, राजा हरिसिंह को समझाने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के द्वितीय सरसंघचालक पू. गुरुजी श्रीनगर गए और उन्होंने राजा हरिसिंह से कहा कि यदि इस राज्य का विलय भारत में नहीं हुआ तो पाकिस्तान इसे हड़प सकता है। कबाइली हमले की सूचना भी राजा हरिसिंह को मिल चुकी थी, इस खतरे को भांपकर राजा हरिसिंह ने भारत के विलय पत्र पर हस्ताक्षर कर दिए। पू. गुरुजी को तबके उपप्रधानमंत्री सरदार पटेल ने ही राजा हरिसिंह को समझाइश देने भिजवाया था। जो हर घटना का संबंध राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जोड़कर हो-हल्ला करते है वे संघ की प्रखर देश भक्ति के कार्यों को जानते नहीं या जानना नहीं चाहते। कश्मीर पर पाकिस्तानी हमले का मुकाबला करने में सेना के साथ संघ के स्वयंसेवकों की भी भूमिका रही। सेना के बड़े विमान को उतरने लायक श्रीनगर का एरोड्रम नहीं होने से स्वयंसेवकों ने विमानतल को साफ और उसको चौड़ा करने का काम किया। उस समय कबाइली हमले प्रारंभ हो गए थे।
भारत की सेना ने जब कबाइली सेना को खदेडऩा प्रारंभ किया और सेना को एक- दो दिन और मिल जाते तो पूरा कश्मीर मुक्त हो जाता। लेकिन बीच में ही नेहरू सरकार ने युद्ध विराम करने के आदेश दिए। इस कारण कश्मीर का एक तिहाई भाग पर पाकिस्तान का कब्जा हो गया। इस स्थिति के लिए तबके प्रधानमंत्री पं. नेहरू जिम्मेदार है। अमित शाह ने आतंकवाद और कश्मीर समस्या के लिए पं. नेहरू की हिमालयीन गलती को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि धार्मिक आधार पर देश के विभाजन के लिए दोषी है तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. नेहरू। यह राष्ट्र विरोधी गलती आसमान से ऊंची और समुद्र से भी गहरी है। कश्मीर समस्या की जड़ में जाना होगा। अमित शाह ने मोदी सरकार की नीति और कार्रवाई की चर्चा करते हुए कहा कि रोग जितना गंभीर होता है उतनी ही प्रभावी दवाई दी जाती है चाहे वह कड़वी क्यों न हो। मोदी सरकार इसी नीति पर चल रही है। भारत की जनता की अपेक्षा है कि कड़वी दवाई कब दी जाएगी। अमित शाह ने भारत और जम्मू-कश्मीर के बीच खाई पैदा करने के लिए भी कांग्रेस को जिम्मेदार ठहराते हुए कहा कि कश्मीर की जनता ने भारत सरकार पर अविश्वास इसलिए किया कि उन्हें लोकतंत्र में भागीदार नहीं होने दिया। फर्जी मतदान कराए, दर्जनों सीटे आवंटित करने का अधिकार प्रशासकीय अधिकारी को दिए। जम्मू-कश्मीर में केवल तीन परिवार सरकार पर काबिज रहे, इनका सीधा सरोकार जनता से नहीं रहा, इसलिए कश्मीर के लोग भारत की मुख्य धारा से कटे रहे। कांग्रेस सरकारे कश्मीरियों का विश्वास प्राप्त करने में सफल नहीं रही। कश्मीर के पहले अमित शाह के दौरे में किसी हुर्रियत नेता ने बंद का आव्हान नहीं किया। कहा जाता है कि गत तीस वर्षों से यह स्थिति बनी कि भारत के गृहमंत्री के कश्मीर में आगमन पर बंद का ऐलान नहीं हुआ। अमित शाह ने गृहमंत्री के नाते कश्मीर का दौरा किया। उस समय इंस्पेक्टर इशरत खान जो, आतंकी हमले में शहीद हुए उनके घर जाकर परिवारजनों को सांत्वना दी और बच्चों के लिए पढ़ाई की व्यवस्था की। पंचायतों के करीब चालीस हजार पंच-सरपंचों के प्रतिनिधियों से मिले। अब पंचायतों को सहायता राशि सीधे उनके खाते में पहुंच रही है। सीमा क्षेत्रों के लोग जो पाकिस्तानी गोलीबारी से पीडि़त है उनके बच्चों को रिजर्वेशन और अन्य सुविधाएं देने की बात भी कही गई। कश्मीर पंडितों के लिए आवास और अन्य सहायता देने की प्रक्रिया प्रारंभ होने की भी जानकारी दी गई। सेना और पुलिस में कश्मीरी युवक बड़ी संख्या में भर्ती हो रहे है। कश्मीर को भारत ने राहत पैकेज भी दिया है। कांग्रेस और भाजपा की वर्तमान मोदी सरकार में अंतर यह है कि कांगे्रस देश विरोधी सपोलों को दूध पिलाती थी, स्टेट होल्डर इस हुर्रियत नेताओं को माना जाता था, जो सुविधाएं सब लेते है लेकिन भारत से अलग होने की बात करते है, ऐसे नेताओं से किसी प्रकार की चर्चा नहीं करने की नीति मोदी सरकार की है। अधिकांश हुर्रियत नेता हिरासत या जेल में है। संसद में पहली बार कश्मीर समस्या की जड़ के बारे में चर्चा हुई। यदि भारत के इतिहास का सच्चाई के साथ अध्ययन किया जाए तो इसी निष्कर्ष पर पहुंचा जाएगा कि हर राष्ट्रीय समस्या के जड़ में पं. नेहरू सरकार की राष्ट्रघाती गलतियां रही है। पहला अवसर है जब कश्मीर समस्या के इतिहास की सच्चाई प्रस्तुत करते हुए संसद से चर्चा हुई है। विपक्ष में रहने के बाद भी हर समस्या के लिए कांग्रेस की ओर अंगुली उठ रही है, यही कारण है कि जब समस्या की जड़ में नेहरूजी का नाम आता है तो कांग्रेसी तिलमिलाकर हो-हल्ला करने लगते है। यही स्थिति उस समय निर्मित हुई जब कश्मीर समस्या के लिए पं. नेहरू की नीतियों की जिम्मेदार ठहराया गया। जब लोकसभा में जम्मू-कश्मीर में राष्ट्रपति शासन छह माह बढ़ाने के विधेयक पर चर्चा हो रही थी तब अधीर रंजन, मनीष तिवारी की ओर से अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग पर सवाल उठाया। इस पर पलटवार करते हुए अमित शाह ने कहा कि कांग्रेस ने राजनैतिक स्वार्थ के लिए 93 बार अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग कर राज्य सरकारों को भंग किया, जबकि छह माह राष्ट्रपति शासन जम्मू-कश्मीर में जारी रखना वहां की जनता और राष्ट्र हित में है। अभी तो गृहमंत्री बने अमित शाह को एक माह भी नहीं हुआ है, उनकी नीतियां और इच्छा शक्ति क्या सरदार पटेल जैसी है? इस सवाल का उत्तर जल्दी ही मिल सकता है? अब अमित शाह ने भाजपा की कमान संभाली तो उनकी संगठन क्षमता की सराहना उस समय हुई जब भाजपा को दुनिया की सबसे बड़ी पार्टी की पहचान मिली, उनकी चुनावी रणनीति के कारण ही नरेन्द्र मोदी की सरकार दूसरी बार अधिक बहुमत के साथ स्थापित हुई। इस कारण अमित शाह को भारतीय राजनीति का चाणक्य कहा गया। देखना यह है कि गृहमंत्री के नाते उनकी क्या पहचान बनती है। एक ओर गृहमंत्री अमित शाह कश्मीर के इतिहास की सच्चाई के साथ लोकसभा में मोदी सरकार की नीतियों और कार्रवाई का उल्लेख कर रहे थे। दूसरी ओर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी-20 सम्मेलन में दुनिया की महाशक्तियों के नायकों से चर्चा कर आतंकवाद के खिलाफ सामूहिक मुकाबला करने के लिए दुनिया को प्रेरित कर रहे है। इसके इसके लिए ग्लोबल सम्मेलन आयोजित करने का प्रस्ताव है। ब्रिक्स में जापान के प्रधानमंत्री और अमेरिकी राष्ट्रपति के साथ प्रधानमंत्री ने चर्चा की दूसरी ओर रूस और चीन के राष्ट्रपतियों से भी प्रधानमंत्री मोदी ने चर्चा की। आतंकवाद को जड़ से समाप्त करने की दृष्टि से अंतर्राष्ट्रीय कूटनीति को सफलता मिल रही है, दूसरी ओर गृहमंत्री अमित शाह शक्ति के द्वारा आतंकवाद और उसके कारणों को समाप्त करने की सक्रिय पहल कर रहे है। अक्सर पं. नेहरू और नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व और उनकी नीतियों की तुलना होती है, इस पर चर्चा भी होती है। दोनों के नेतृत्व में मौलिक अंतर यह है कि पं. नेहरू ने प्रधानमंत्री होते हुए स्वयं को अंतर्राष्ट्रीय नेता के नाते स्थापित किया। दूसरी ओर नरेन्द्र मोदी ने अंतर्राष्ट्रीय नेता के नाते स्वयं की बजाय राष्ट्र हित को प्राथमिकता दी। (लेखक - वरिष्ठ पत्रकार एवं लेखक हैं)