आत्मज्ञान के मार्ग की पहली साधना इंद्रिय निग्रह
   Date02-Jul-2019

धर्मधारा
मा नव शरीर में पांच ज्ञानेन्द्रियां है जो कि इस सृष्टि के पदार्थों का हमें ज्ञान कराती है। वास्तव में इन ज्ञानेन्द्रियों से ही यह भौतिक संसार हमारे अंदर पहुंचता है। शब्द, रस, रूप, स्पर्श, गंध के रूप में आंख,नाक, कान, जीभ एवं त्वचा द्वारा यह जानकारी अंदर पहुंचने पर मन में विषय भोग के विचारों का सिलसिला शुरू होता है और वस्तु/व्यक्ति (विषय भोग) के लिए इच्छा मन में जाग्रत होती है। यह इच्छा वस्तु प्राप्त करने, स्थान घूमने, नाटक-फिल्म देखने, किसी स्त्री-पुरुष से मिलने या अन्यान्य कल्पित सुख-भोग, मनोरंजन के लिए होती है। इस प्रकार हमारी ज्ञानेन्द्रियां इच्छा को जगाने तथा बार-बार के प्रयास से उस इच्छा को दृढ़ करने का कार्य करती है।
क्या समझदार (ज्ञानी) व्यक्ति को इन ज्ञानेन्द्रियों को दबाना चाहिए? गीता आचार्य कहते हैं कि नहीं, इन्हें ताले में बंद करके नहीं रखा जा सकता। क्योंकि सांसारिक व्यवहार के लिए इनका उपयोग आवश्यक है। यदि ज्ञानेन्द्रियों को जबर्दस्ती दबाएंगे तो उसका विपरीत प्रभाव पड़ेगा। विषय भोग के विचार मन में सदैव हलचल, द्वन्द्व मचाए रखेंगे, जिससे मनुष्य अशांत और परेशान रहेगा। अत: पण्डित (आत्म ज्ञानी) लोग इन्द्रियों को अपने विवेक द्वारा अनुशासन में रखने की सलाह देते हैं। यह कार्य वैसा ही है जैसे सभी प्रकार की खाद्य सामग्री उपलब्ध होने पर भी कई लोग एकादशी-पूर्णिमा के दिन व्रत-उपवास करते हैं। अत: बुद्धि विवेक के आधार पर इन्द्रियों को विषय-भोग से विरक्त करने अथवा अनुशासन में रखने (शास्त्र सम्मत) नियमों का पालन करने को ही दम: अथवा इन्द्रिय-निग्रह कहा गया है।
इसके लिए आवश्यक है कि मनुष्य को इन्द्रिय निग्रह के महत्व तथा लाभ की जानकारी हो। उसे ज्ञान होना चाहिए कि विषय-भोग की इच्छा अनन्त होती है।