सत्संग के बगैर मोह का नाश संभव नहीं
   Date12-Jul-2019

धर्मधारा
गो स्वामी श्रीतुलसीदासजी महाराज 'सत्संगÓ का महत्व बतलाते हुए कहते हैं -
बिनु सतसंग न हरि कथा तेहि बिनु मोह न भाग।
मोह गएँ बिनु राम पद होइ न दृढ़ अनुराग।।
सत्संग के बिना हरि-कथा नहीं मिलती, हरिकथा के बिना मोह का नाश नहीं होता और मोह का नाश हुए बिना भगवान के चरणों में दृढ़ प्रेम नहीं होता। साधारण प्रेम प्राप्त होने के तो और भी बहुत-से उपाय हैं, पर दृढ़ प्रेम मोह रहते नहीं होता और दृढ़ प्रेम के बिना भगवान की प्राप्ति नहीं होती। भगवान मिलते ही हैं प्रेम से। श्रीरामचरितमानस के बालकाण्ड में देवताओं के प्रति भगवान् श्री शिवजी के वचन हैं-
हरि ब्यापक सर्बत्र समाना।
प्रेम तें प्रगट होहिं मैं जाना॥
'हरि सब जगह समान भाव से व्याप्त हैं और वे प्रेम से प्रकट होते हैं। इससे यही सिद्ध होता है कि भगवान् प्रेम से मिलते हैं और प्रेम प्राप्त होता है सत्संग से। इसलिए मनुष्य को सत्संग के लिए विशेष प्रयत्नशील रहना चाहिए। सत्पुरुषों का सेवन न मिले तो स्वाध्याय करना चाहिए। सत्-शास्त्रों का स्वाध्याय भी सत्संग के समान है। सत्संग के चार प्रकार हैं। पहले नम्बर के सत्संग का अर्थ समझना चाहिए सत्-परमात्मा में प्रेम।
सत् यानी परमात्मा और संग यानी प्रेम। यही सर्वश्रेष्ठ सत्संग है। सत् यानी परमात्मा के संग रहना अर्थात् परमात्मा का साक्षात् दर्शन करके भक्त का उनके साथ रहना भी सत्संग है। यही सत्पुरुष का संग है, क्योंकि सर्वश्रेष्ठ सत्-पुरुष तो एक भगवान् ही हैं। इनके सामने स्वर्ग की तो बात ही क्या है, मुक्ति भी कोई चीज नहीं है। श्रीतुलसीदासजीने इसी विशेष सत्संग की बड़े मार्मिक शब्दों में महिमा गाई है। वे कहते हैं-
तात स्वर्ग अपबर्ग सुख धरिअ तुला एक अंग। तूल न ताहि सकल मिलि जो सुख लव सतसंग॥
हे तात! स्वर्ग और मुक्ति के सुख को तराजू के एक पलड़े पर रखा जाए और दूसरे पलड़े पर क्षणमात्र के सत्संग को रखा जाए तो भी एक क्षण के सत्संग के सुख के समान उन दोनों का सुख मिलकर भी नहीं होता।