कांग्रेस में असमंजस
   Date12-Jul-2019

कांग्रेस पार्टी की मुसीबतें कम होने का नाम नहीं ले रही है। राहुल गांधी ने बुधवार को कांग्रेस अध्यक्ष पद से इस्तीफे की घोषणा कर करीब एक महीने से बनी असमंजस की स्थिति को समाप्त कर दिया है। गोवा में कांग्रेस के विधायक भाजपा में शामिल हो गए हैं। कर्नाटक में संकट चल ही रहा है। राहुल गांधी नेे अपने पत्र में लिखा है कि प्रतिद्वंद्वियों को हम तब तक नहीं हरा सकते जब तक सत्ता की चाहत छोड़कर विचारधारा की एक बड़ी लड़ाई लडऩे का मन नहीं बनाते। राहुल के इस फैसले के बाद कांग्रेस को अब अपने नए अध्यक्ष का चुनाव करना है। पार्टी संविधान के अनुसार, अध्यक्ष पद खाली रहने की स्थिति में पार्टी का सबसे वरिष्ठ महासचिव अस्थायी तौर पर अध्यक्ष का कामकाज संभाल लेता है। लेकिन कांग्रेस को लेकर देशभर में उत्सुकता यह है कि पार्टी का नेतृत्व गांधी-नेहरू परिवार से बाहर के किसी व्यक्ति के हाथ में जाने पर क्या वह एकजुट रह पाएगी? बीती आधी सदी का पार्टी इतिहास यही बताता है कि जब-जब उसकी कमान गांधी-नेहरू परिवार से बाहर गई, पार्टी खंडित हुई। लोगों को पता है कि कौन उनसे निरंतर संवाद कर रहा है। किससे वे अपने दुख-सुख को साझा कर सकते हैं। यानी पार्टियों का सिर्फ चुनाव में दिखना काफी नहीं है। हर दिन की सक्रियता उनके लिए जरूरी हो गई है। इसके लिए मजबूत जमीनी संगठन उनके पास होना चाहिए, जिसे खड़ा करना कांग्रेस भूल चुकी है। स्थानीय इकाइयों के चुनाव के नाम पर वहां बस रस्म-अदायगी होती है। ज्यादातर जिलों में संगठन कागज पर चल रहा है। एक समय कांग्रेस में क्षेत्रीय नेताओं की भरमार हुआ करती थी, जो जनता से जमीनी संवाद के दम पर पार्टी को वोट दिलाया करते थे। ऐसे नेताओं का अब वहां घोर अभाव हो गया है और हर बात में आलाकमान का मुंह ताकने का चलन चल पड़ा है। अच्छा होता कि राहुल गांधी अपने त्यागपत्र में इन मुद्दों पर बात करते। इससे नए अध्यक्ष के सामने उसका कार्यभार स्पष्ट होता। नेहरू-गांधी परिवार से बाहर का कोई नेता कांग्रेस को अच्छी तरह चला सकता है, बशर्ते यह परिवार पार्टी में उसकी अथॉरिटी स्थापित होने दे। इसमें कोई शक नहीं कि गांधी-नेहरू परिवार मौजूदा कांग्रेस की रीढ़ है। पार्टी के भीतर नई कार्य संस्कृति उसकी कोशिशों से ही आएगी। लेकिन यह काम उसे खुद को पीछे रखते हुए करना होगा। नए अध्यक्ष के नेतृत्व में अगर कांग्रेस के भीतर जमीनी कामकाजी टीम स्पिरिट पैदा की जा सकी तो यह भारतीय लोकतंत्र के लिए भी एक खुशखबरी होगी।
दृष्टिकोण
हार का जिम्मेदार कौन ?
शीर्ष क्रम के बल्लेबाजों की नाकामी के कारण भारत को आईसीसी विश्वकप के सांसों को रोक देने वाले पहले सेमीफाइनल में बुधवार को 18 रन की हार का सामना करना पड़ा और इसके साथ ही भारतीय टीम विश्वकप से बाहर हो गई। भारत की हार के साथ ही करोड़ों भारतीयों का सपना एक झटके में टूट गया। हार के बाद भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, राहुल गांधी, लता मंगेशकर ने ट्वीट कर भारतीय टीम का हौंसला हालांकि बढ़ाया है, लेकिन इस हार का जिम्मेदार कौन है? क्या भारत का दिन खराब था या हमारे बल्लेबाज ही खराब खेलें।
इस मामले में फेसबुक, ट्वीट्र, वाट्सएप पर प्रतिक्रियाओं की बहार चल रही है। कोई धोनी को दोष दे रहा है तो कोई विराट कोहली को तो कोई ऋषभ पंत को। वैसे गौतम गंभीर, सौरव गांगुली, लक्ष्मण जैसे विशेषज्ञों ने कहा कि धोनी को हार्दिक पांड्या के पहले बल्लेबाजी करना था। उन्हें सातवें नंबर पर बल्लेबाजी करने भेजना गलत रहा। क्योंकि अगर धोनी उस समय बल्लेबाजी करने जाते, तब ऋषभ पंत जोरदार बल्लेबाजी कर रहे थे, मगर एक गलत शाट ने मैच का रुख पलट दिया। यदि धोनी उस समय मैदान पर होते तो पंत का हौंसला भी बढ़ाते और एक साइड से बल्लेबाजी कर अपने अनुभव से साथी बल्लेबाजों की मदद करते। धोनी ने बहुत बार यह किया है। मगर अब सिर्फ यह बातें ही रह गई है। टीम इंडिया की हार से पूरा देश दुखी है। करोड़ों क्रिकेट प्रेमियों का दिल टूट गया है। भारतीय टीम पूरे टूर्नामेंट में बहुत अच्छा खेली, मगर 40 मिनिट के खेल ने सब कुछ बदल दिया। अब तो बस इतना ही कहा जा सकता है.. आने वाले समय का इंतजार करें।