ईमानदारी
   Date12-Jul-2019

प्रेरणादीप
वी रेश्वर मुखोपाध्याय नाम का बालक अपने एक मित्र के साथ घर के बाहर अलाव तापता हुआ पढ़ाई कर रहा था। इस बीच वहां एक व्यापारी आया। वह भी अलाव तापने बैठ गया। कुछ देर वह अपने रास्ते चल पड़ा। उसके जाने के बाद वीरेश्वर के साथी की नजर उस जगह गई जहां वह व्यापारी बैठा था। उसे वहां कपड़े में लिपटी थैली नजर आई। उसने जब उसे खोला तो उसकी आँखें फटी की फटी रह गई। उसमें 100-100 रु. के काफी सारे नोट रखे हुए थे। उसने पढऩे में तल्लीन वीरेश्वर को झिंझौड़ा और सारी बात बताई। वीरेश्वर ने कहा- 'यह रुपयों की थैली उसी व्यापारी की है जो हमारे साथ अलाव ताप रहा था। हमें इसे लौटाना चाहिए। इस पर उसका साथी बोला- 'क्यों हाथ आई लक्ष्मी को यों लौटाते हो? यह सुनकर वीरेश्वर ने गुस्से में कहा- 'चाहे जो भी हो जाए, हमें दूसरे के धन पर ऐसी नीयत नहीं रखनी चाहिए। हम गरीब जरूर हैं, लेकिन ईमानदारी ही हमारा सच्चा धन है।Ó इतना कहकर उसने अपने साथी के हाथ से वह थैली छीनी। उसने व्यापारी को जोर से आवाज लगा कर रोका। उसके पास पहुँचकर उसने उसे पूरी बात बताई और कहा- 'संभालो अपनी अमानत।Ó