परमात्मा का साक्षात पूजन है परोपकार
   Date11-Jul-2019

धर्मधारा
प रोपकार एक परम पवित्र भावना है। इसमें पाने, पाने की नहीं, सिर्फ देने, देने की चाहत है। परोपकार तो हृदय के प्रेम सिंधु, करुणा सिंधु में उठ रही वे लहरें हैं, जो नररूपी नारायण व जीवरूपी शिव का अभिषेक करना चाहती है। ऐसे सहृदय लोग तो सृष्टि के कण-कण में, हर जीव में अपने शिव को देखते हैं, आराध्य को देखते हैं। अब तो सम्पूर्ण सृष्टि ही उनके लिए शिवालय है, देवालय है और हर जीव शिव की प्रतिमाएं हैं। अब तो वे इसी देवालय में, शिवालय में बैठकर परसेवा, परोपकार कर अपने आराध्य की अभ्यर्थना, आराधना करना चाहते हैं। अब उनके द्वारा की गई औरों की हरेक सेवा ही ईश-पूजा है, ईश-उपासना है, पर ऐसी उपासना करने वाले विरले ही होते हैं, इसलिए संत कबीर कह रहे हैं -
जो कोई कर सो स्वारथी, अरसू परस गुन देत।
किए बिना कर सूरमा, परमारथ के हेत।
अर्थात् जो कोई परस्पर लेता देता है तो ये सब स्वार्थ हैं, पर दूसरों से कुछ न पाने पर भी दूसरों की भलाई में जो तत्पर है, वो ही वास्तव में शूरवीर है। निस्संदेह परोपकार परमात्मा का साक्षात् पूजन है। यह स्वयं में बहुत बड़ी साधना है, जिसे सच्चे व निष्काम भाव से करते रहने पर व्यक्ति को वह सब कुछ प्राप्त हो जाता है, जो बड़ी-बड़ी दुर्लभ साधनाओं से ही प्राप्त कर पाना संभव है। यहां तक कि मुक्ति का द्वार भी इसी माध्यम से खुल जाता है। गोस्वामी तुलसीदासजी रामचरितमानस में भगवान श्रीराम के माध्यम से जटायु को यही संदेश देते हैं -
परहित बस जिन्ह के मन मानीं।
तिन्ह कहुँ जग दुर्लभ कहु नाही।।
तनु तजि तात जाहु मम धामा।
देउँ काह तुम्ह पूरनकामा।
अर्थात् जिनके मन में दूसरे का हित बसता है, समाया रहता है, उनके लिए जगत में कुछ भी दुर्लभ नहीं है, वे मेरे परमधाम के निवासी होते हैं। सचमुच कितनी अद्भुत है परोपकार की महिमा। इसलिए हमें इसी पथ का पथिक बनना चाहिए।