टखने रगड़ते जनसंख्या नियंत्रण के प्रयास
   Date11-Jul-2019

रोहित कौशिक
सं युक्त राष्ट्र की हाल में आई रिपोर्ट 'द वल्र्ड पॉपुलेशन प्रॉस्पेक्ट्स 2019 : हाइलाइट्सÓ में बताया गया है कि अगले तीन दशकों में दुनिया की आबादी दो अरब और बढ़ जाएगी और 2050 तक धरती पर आबादी का आंकड़ दस अरब को छू रहा होगा। रिपोर्ट के मुताबिक अगले सात साल में यानी 2027 तक आबादी के मामले में भारत चीन को पछाड़ देगा। भारत की आबादी में 2050 तक सत्ताईस करोड़ से ज्यादा की वृद्धि हो सकती है और इसके साथ ही भारत दुनिया में सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश बन सकता है। रिपोर्ट में बताया गया है कि वैश्विक जनसंख्या में जो वृद्धि होगी, उसमें आधी से अधिक वृद्धि भारत, नाइजीरिया, पाकिस्तान, कांगो, इथियोपिया, तंजानिया, इंडोनेशिया, मिस्र और अमेरिका में होने का अनुमान है। इन देशों में भी सबसे अधिक वृद्धि भारत में होगी। हालांकि जनसंख्या वृद्धि दर में लगभग हर जगह गिरावट दर्ज की जा रही है। वैश्विक स्तर पर प्रति महिला औसत जन्म दर 1990 में 3.2 थी, जो 2019 में घटकर 2.5 रह गई। दुनिया के पचपन देश ऐसे भी हैं जहां आबादी घट रही है। यह कमी सिर्फ जन्म दर में गिरावट के कारण नहीं आ रही है। कुछ देशों में इसके लिए लोगों का पलायन भी जिम्मेदार है।
स्वास्थ्य सुविधाएं बढऩे के साथ ही पूरी दुनिया में बुजुर्ग आबादी का हिस्सा भी बढ़ता जा रहा है। इस समय दुनिया में सबसे अधिक जनसंख्या वाले देशों में पहला स्थान चीन का है और दूसरा भारत का। चीन ने जनसंख्या में कमी लाने के लिए अनेक योजनाएं प्रारंभ की हैं। इससे चीन में जनसंख्या बढऩे की दर में कमी आई है। 2010 के बाद से सत्ताईस देश ऐसे हैं जिनकी जनसंख्या में एक या इससे भी अधिक फीसद की कमी आई है। वर्ष 2019 से 2050 तक पचपन देशों और क्षेत्रों में आबादी में कमी आने का अनुमान है। हालांकि भारत में जनसंख्या नियंत्रण को लेकर गंभीर प्रयास नहीं हुए हैं लिहाजा, भारत के लिए बढ़ती आबादी भविष्य में अनेक चुनौतियां पेश करेगी। भारत में जितनी तेजी से संपन्नता बढ़ रही है, उतनी ही तेजी से शहरी जनसंख्या भी बढ़ रही है। तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था वाले भारत को भविष्य में जनसंख्या वृद्धि के कारण अनेक चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। अगले चालीस वर्षों में भारत के समक्ष अपने नागरिकों को नौकरी, ऊर्जा, आवास और आधारभूत संरचना उपलब्ध कराने की चुनौती होगी। रिपोर्ट में बताया गया था कि 2050 तक भारत में शहरी जनसंख्या में उनचास करोड़ सत्तर लाख की वृद्धि होगी। भारत आज गंभीर समस्याओं से जूझ रहा है। यदि यह कहा जाए कि अधिकांश समस्याओं की जड़ जनसंख्या विस्फोट है तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी। हालांकि हमारे नीति-निर्माताओं ने तीन-चार दशक पहले ही जनसंख्या विस्फोट से उत्पन्न खतरों को भांप लिया था। इस समस्या से निपटने के लिए अनेक योजनाएं भी बनाई गर्इं, लेकिन ये सभी योजनाएं आबादी नियंत्रण के लक्ष्य में नाकाम रहीं। यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि जनसंख्या नियंत्रण के प्रति जनता में जागरूकता का अभाव दिखाई देता है। आज सरकार करोड़ों रुपए विज्ञापनों पर खर्च कर रही है, लेकिन जनसंख्या तेजी से बढ़ती जा रही है। इसके पीछे काफी हद तक हमारे देश की सामाजिक एवं सांस्कृतिक संरचना भी जिम्मेदार है। दूसरी ओर परिवार नियोजन संबंधी नीतियों को भी प्रभावी तरीके से लागू नहीं किया गया। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम सब इस समस्या पर गंभीरता के साथ पुनर्विचार करें, ताकि भविष्य में जनसंख्या विस्फोट से होने वाली समस्याओं से छुटकारा मिल सके।
भारत में प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन को लेकर बड़ी-बड़ी बातें हो रही हैं, लेकिन हम यह नहीं समझ पा रहे हैं कि जनसंख्या वृद्धि भी जलवायु परिवर्तन को प्रभावित कर रही है। दरअसल, आबादी बढऩे से प्राकृतिक संसाधनों का दोहन भी बढ़ता है और प्रदूषण जैसी समस्याएं पैदा होती हैं। इसलिए जलवायु संकट का प्रभाव कम करने के लिए भी जनसंख्या वृद्धि पर नियंत्रण आवश्यक है। हमें कुछ ऐसी नीतियां बनानी होंगी जिनसे जनता स्वयं इसमें रुचि ले। इमरजंसी के दौरान जिस तरह जनसंख्या नियंत्रण के प्रयास किए गए थे, वे किसी से छिपे नहीं हैं। उस समय सरकार के इस प्रयास के विरोध में जनता जबरदस्त गुस्से में थी और इसका खमियाजा सरकार को उठाना पड़ा था। इसलिए यह स्पष्ट है कि यदि जनसंख्या नियंत्रण की नीतियों और जनअवधारणों के बीच असंतुलन और संवादहीनता की स्थिति कायम रहेगी तो बेहतर परिणाम सामने नहीं आएंगे। यह दुर्भाग्यपूर्ण ही है कि पिछले पचास वर्षों में सरकार और विभिन्न सामाजिक संगठन जनता के साथ एक ऐसा संवाद स्थापित करने में नाकाम रहे हैं, जिससे कि इस समस्या का स्थायी समाधान निकल सके। आज विभिन्न धार्मिक एवं राजनीतिक नेता बड़े-बड़े समारोहों में जनता को इस देश की अनेक गंभीर समस्याओं के बारे में बताते हैं। इन समारोहों में नेताओं और धर्मगुरुओं द्वारा शायद ही कभी जनसंख्या वृद्धि की समस्या पर चर्चा की जाती है। कुछ धर्मगुरु तो अपने उपदेशों और पत्रिकाओं में अपनी-अपनी जाति की जनसंख्या बढ़ाने का आह्वान बड़े गर्व से करते हैं। दरअसल, आज जनसंख्या नियंत्रण सरकारी नीतियों एवं योजनाओं के माध्यम से ही होने वाला नहीं है। जब तक इस समस्या पर आम जनता ही विचार नहीं करेगी तब तक इस संबंध में किसी सार्थक परिणाम की उम्मीद रखना बेमानी है। भारत में आज भी करोड़ों लोग गरीबी रेखा से नीचे जीवनयापन कर रहे हैं। इस वर्ग का बड़ा हिस्सा निरक्षर और अशिक्षित है। ऐसी स्थिति में बड़े-बड़े विज्ञापन और परिचर्चाएं किस हद तक प्रभावी होंगी, यह विचारणीय प्रश्न है। इस तबके को गर्भ निरोध के साधन उपलब्ध कराना और इनका सही ढंग से इस्तेमाल सिखाना भी एक बड़ी चुनौती है। जब तक हम इस चुनौती को स्वीकार नहीं करेंगे, तब तक जनसंख्या वृद्धि को नियंत्रित करना एक दिवास्वप्न ही होगा। यह विडंबना ही है कि आज भी जनसंख्या नियंत्रण की अधिकांश योजनाएं और काम कागजों पर ही चल रहे हैं।
जनसंख्या नियंत्रण में लगी अधिकांश स्वयंसेवी संस्थाएं भी कुछ कम नहीं हैं। कुछ अपवादों को छोड़ कर आज ये संस्थाएं भी लाभ कमाने के लिए ही काम कर रही हैं। गैर सरकारी संगठनों पर पानी की तरह पैसा बहाया जा रहा है। सरकारी नीतियों का आलम यह है कि इस दौर में भी प्रलोभन देकर नसबंदी कराई जा रही है। इस कार्य के लिए किसी प्रकार का प्रलोभन नहीं दिया जाना चाहिए। प्रलोभन से इस समस्या को जड़ से समाप्त नहीं किया जा सकेगा, बल्कि इससे भ्रष्टाचार को ही बढ़ावा मिलता है।हमारे देश में परिवार का भरण-पोषण शारीरिक श्रम पर आधारित था।
इसलिए यहां ज्यादा बच्चे पैदा करने पर जोर दिया जाता था। हालांकि अब यह स्थिति बदल रही है। लेकिन अभी भी विकास की किरणें निचले स्तर तक नहीं पहुंच पा रही हैं। ऐसे में गर्भनिरोधकों का व्यापक पैमाने पर मुफ्त वितरण और किसी किस्म की जटिलता उत्पन्न होने पर उसका तात्कालिक समाधान निकालने के लिए व्यापक नेटवर्क विकसित किया जाना चाहिए। हमें गर्भ निरोधकों से जुड़ी उन भ्रांतियों के निवारण पर भी ध्यान देना होगा जिन्हें अनपढ़ लोग खुद ही गढ़ लेते हैं। बहरहाल, आज जनसंख्या नियंत्रण से संबंधित कोई भी योजना लागू करते समय व्यावहारिक पहलुओं पर ध्यान दिया जाना चाहिए। आज लोगों को यह समझाने की जरूरत है कि जनसंख्या वृद्धि से देश का नुकसान तो होगा ही, पहले उनकी अपनी समस्याएं भी बढ़ जाएंगी।