चूक गए मौका 'तरुण' होते हुए भी
   Date11-Jul-2019

बजट प्रतिक्रिया
डॉ. मंगल मिश्र
तरुण शब्द प्रतीक है ऊर्जा से भरपूर ऐसी युवा अवस्था का, जो चुनौती का सामना करने के लिए तैयार हो, जिसमें नए विचारों को, नई योजनाओं को और नए संकल्पों को विचारित, संकल्पित तथा क्रियान्वित करने की शक्ति हो। कमलनाथ सरकार के पहले बजट को प्रस्तुत करते समय वित्त मंत्री तरुण भनोत ने इन सब चुनौतियों को स्वीकार करने का पूरा साहस नहीं दिखाया। यह उम्मीद थी कि नए बजट में राजकोषीय घाटा 3 प्रतिशत से कम होगा, लेकिन घाटा 3.34 प्रतिशत रहा और विकास कार्यों के लिए केवल 32 हजार करोड़ रु. प्राप्त हो सके। सरकार की राजस्व प्राप्तियों में 19 प्रतिशत और पंूजीगत प्राप्तियों में 13 प्रतिशत की वृद्धि अनुमानित है, जबकि व्ययों में क्रमश: 18 और 21 प्रतिशत की वृद्धि होना है। सरकार यह भी उम्मीद कर रही है कि केंद्रीय करों में उसका हिस्सा 11 प्रतिशत बढ़ जाएगा और राज्य का कर राजस्व भी 24 प्रतिशत बढ़ जाएगा। यह अनुमानित बजट अंतत: घाटे को बढ़ाने वाला दिखाई दे रहा है। सरकार ने अपने राजस्व व्ययों को नियंत्रित करने की कोई योजना नहीं बनाई है। कृषि क्षेत्र में किसान ऋणमाफी जैसा संवेदनशील विषय केवल 8 हजार करोड़ रु. के प्रावधान तक सीमित हो गया है। निश्चित रूप से यह राशि बहुत कम है। कृषि क्षेत्र में सरकार ने 66 प्रतिशत बजट प्रावधान तो बढ़ाए हैं, लेकिन आपातकालीन परिस्थितियों के लिए प्रावधान अपर्याप्त है। स्वास्थ्य क्षेत्र में चिकित्सा शिक्षा के लिए केवल 14 प्रतिशत की वृद्धि की गई है और उच्च शिक्षा के लिए यह वृद्धि सिर्फ 12 प्रतिशत है। ऐसे में इन क्षेत्रों के लिए विकास की आवश्यकताएं कैसे पूरी होंगी? सरकार ने आदिम जाति कल्याण के लिए संकल्प तो व्यक्त किया है, पर बजट में केवल 7 प्रतिशत प्रावधान बढ़ाए हैं।
सकल घरेलू उत्पाद की तुलना में राज्य का ऋण बढ़कर 21.88 प्रतिशत हो गया है, जो वास्तव में चिंताजनक है। दूसरी ओर राजस्व प्राप्तियों में वेतन का जो प्रतिशत वर्ष 2014 में 24 प्रतिशत और गत वर्ष 19 प्रतिशत था, उसे घटाकर 18 प्रतिशत लाने में सरकार कामयाब हो गई है। सरकार का जोर यथास्थितिवादिता पर रहा है। नई महत्वाकांक्षी योजना किसी भी क्षेत्र में सरकार लागू नहीं कर पाई, फिर भी इस बजट के कुछ उजले पक्ष भी हैं। तकनीकी शिक्षा और कुशलता विकास के लिए सरकार ने भारी बजट प्रावधान किया है। महिलाओं के लिए ई-रिक्शा की योजना चलाई है, निजी क्षेत्र में 70 प्रतिशत स्थानीय लोगों को रोजगार, 100 यूनिट बिजली का बिल 100 रु. करना, इंदौर-भोपाल एक्सप्रेस-वे, नदियों को पुनर्जीवित करना, खानपान को बड़े पैमाने पर उद्योग जैसा चलाना और ये सब करते हुए भी कोई नया कर नहीं लगाना-सरकार की बड़ी सफलता है।
प्रदेश में पहली बार अध्यात्म विभाग का गठन करना वास्तव में स्वागतयोग्य है। गौशाला के लिए विशेष प्रावधान है, लेकिन प्रत्येक गाय के लिए 20 रु. प्रतिदिन का प्रावधान गाय के मुंह में जीरे जैसा है। इंदौर, ग्वालियर, भोपाल में बर्न यूनिट खोलना, स्वास्थ्य और जल को अधिकार बनाना, सामाजिक सुरक्षा का दायरा बढ़ाना वास्तव में स्वागतयोग्य है। इन विशेषताओं के बावजूद पूरे बजट में कहीं भी प्रदेश के विकास का या आधारभूत संरचना के सुधार को कोई दीर्घकालीन दृष्टिकोण दिखाई नहीं देता। सरकार के वचन-पत्र के अनुरूप न तो कोई दूरदर्शी विकास योजना है और न राजस्व की दृष्टि से कोई साहसिक कदम, इसलिए कुल मिलाकर बजट को चलती का नाम गाड़ी कहना उपयुक्त होगा।