कश्मीर की स्थिति में सुधार
   Date11-Jul-2019

कश्मीर की समस्या को पैदा करने और उसके निराकरण के ठोस प्रयास नहीं होने से कश्मीर घाटी आतंकियों का अड्डा बन गया है। हालत यह हुआ कि कश्मीर में तुष्टिकरण की नीति अपनाई गई। हुर्रियत और अन्य अलगाववादी संगठनों के प्रति नरमी बरतने और उनको गले लगाने की नीति से कश्मीर की घाटी में पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवाद की हिंसा बढ़ती गई। जिस तरह 1947 में कांग्रेस नेतृत्व ने मजहबी सांप्रदायिकता के सामने घुटने टेक कर देश का विभाजन स्वीकार किया। उसी तरह कांग्रेस सरकारों ने तुष्टीकरण और देशद्रोहियों के साथ चर्चा करने से स्थिति बिगड़ती रही। पहली बार राष्ट्रवादी मोदी सरकार ने कश्मीर की स्थिति सुधारने के लिए कड़े कदम उठाए। गृह मंत्री अमित शाह ने स्पष्ट कहा है कि हम आतंकवाद के खिलाफ नो टॉलरेंस की नीति अपनाएंगे। अलगाववादियों नेताओं की विशेष सुरक्षा-व्यवस्था हटा दी गई है। इनके खिलाफ टेरर फंडिंग की एनआईए जांच कर रही है। कांग्रेस सरकारे अलगाववादियों को दावतें देती रही और ये कश्मीर को निर्दोष के खून से रंगते रहे। देशविरोधी तत्वों के खिलाफ सख्त कार्रवाई का परिणाम यह हुआ कि पिछले वर्ष के मुकाबले 2019 में जम्मू-कश्मीर में सीमा पार से घुसपैठ की घटनाओं में 43 प्रतिशत की कमी आई है। विशेष रूप से बालकोट एयर स्ट्राईक के बाद छह माह में सुरक्षा बलों को काफी सफलता मिली है। यह जानकारी देते हुए गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने लोकसभा में बताया कि आतंकी संगठनों में युवाओं की भर्ती में भी 40 प्रतिशत की कमी आई है। राज्य में आतंकी घटनाओं में भी 28 प्रतिशत कमी आई है। गत वर्ष की तुलना में 22 प्रतिशत अधिक आतंकी मारे गए हैं। कश्मीर की स्थिति में यह बदलाव इसलिए आया है कि आतंकियों के खिलाफ जीरो टॉलरेंस अर्थात् जो आतंकी घुसपैठ करे, उसे खत्म कर दिया जाए। इसी तरह सुरक्षा बलों को भी खुली छूट है कि वे सीमा पार के दुश्मनों का सफाया करे। ऐसी स्थिति में हुर्रियत के नेता सरकार से चर्चा के लिए गिड़गिड़ा रहे हैं। दूसरी ओर केन्द्र सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि वे देश विरोधी तत्वों के साथ कोई चर्चा नहीं करेंगे। उन्हीं लोगों से चर्चा हो सकती है, जो संविधान में विश्वास करते हैं और भारत को अपना देश मानते हैं। सोशल मीडिया में जो समूह चर्चा होती है, जब भारतीय होने का सवाल पूछा जाता है तो वे इस सवाल का उत्तर देने की बजाय कश्मीरियत का राग अलापने लगते हैं। जब उनसे पूछा जाता है कि बुरहानवानी आतंकवादी था या नहीं, तो इस बारे में भी वे उत्तर नहीं देते। जब तक देश को अपना मानने वाले लोग कश्मीर में प्रभावी नहीं होते, तब तक स्थिति सामान्य नहीं हो सकती। हालांकि स्थिति में निर्णायक बदलाव हो रहा है, पहली बार जब भी कोई गृहमंत्री कश्मीर जाता था तो हुर्रियत के द्वारा वहां बंद का ऐलान होता था, लेकिन जब गृहमंत्री अमित शाह कश्मीर गए तो किसी ने बंद का ऐलान करने की हिम्मत नहीं की।
दृष्टिकोण
यह है राहुल का संघर्ष
कुछ लोग अपनी गलतियों को महिमामंडित कर इतराते रहते हैं, ऐसे लोगों के बारे में कहा जाता है कि चोरी और सीना जोरी भारत के इतिहास में ऐसी कई घटनाएं दर्ज है, रावण ने अपने जीवनकाल में कई अपराध किए, लेकिन उसने कभी स्वयं को अपराधी नहीं माना। इसी तरह महाभारत काल में दुर्योधन ने अपने कुल का नाश होते हुए देखकर भी अपने किए पर पश्चाताप नहीं किया। वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में राहुल गांधी ऐसे नेता है, जो यह स्वीकार करने को तैयार नहीं है कि उनकी सरकार ने कोई गलती की है। इसी तरह वे यह भी स्वीकार करने को तैयार नहीं है कि कांग्रेस नेतृत्व के कारण कश्मीर और आतंकवाद की गंभीर समस्या पैदा हुई है। इन दिनों वे मानहानि के दावों का सामना कर रहे हैं। गौरीलंकेश के मामले में जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर हत्या का आरोप लगाया तो एक स्वयंसेवक ने राहुल पर मानहानि का मामला दर्ज किया। जमानत पर छूट जाने के बाद उन्होंने विजेता यौद्धा की तरह कहा कि मुझ पर आक्रमण हो रहे हैं। यह विचारधारा का संघर्ष है। संघ और भाजपा के विचारों के खिलाफ संघर्ष करता रहूंगा। गलत आरोप लगाकर कोर्ट में आरोपों को नकार कर खेद व्यक्त करना ही क्या विचारों का संघर्ष है? इसी तरह गुजरात की दो अदालतों ने मानहानि के मामले में राहुल गांधी के खिलाफ समन जारी हुए है। सूरत अदालत में याचिका में आरोप लगाया है कि राहुल गांधी ने गृहमंत्री अमित शाह को हत्या का आरोपी बताते हुए कहा था कि सभी चोरों का उपनाम मोदी है। इस मामले में राहुल को 16 जुलाई को पेश होना है।