ईमानदारी
   Date11-Jul-2019

प्रेरणादीप
कौ शांबी राज्य में एक बार भयंकर अकाल पड़ा। लोग दाने-दाने को मोहताज हो गए। अनाज के भाव आसमान चूमने लगे। निर्धनों की मृत्यु का तांता लग गया। नगर के नगर और गांव के गांव खाली हो गए। जो थोड़े बहुत बचे, उन्होंने भी अपने प्राणों की रक्षा के लिए चोरी, ठगी, बेईमानी आदि बुरे कर्म करके धन कमाना और पेट पालना प्रारंभ कर दिया।
इसी नगर में संतोष नाम का एक ईमानदार मजदूर रहता था। उसकी धर्मपत्नी शांति भी बड़ी ईमानदार और पतिपरायण थी। वे दिन भर कड़ी मेहनत करते और जो कुछ मिलता, उसे बच्चों को खिला देते व स्वयं भूखे सो जाते, पर कुछ दिनों में उन्हें भी अन्न का मिलना बंद हो गया। दोनों बच्चे अकाल की भेंट चढ़ गए। एक दिन भूखा-प्यासा संतोष शांति के साथ घर लौट रहा था। उसने रास्ते में सोने का एक कड़ा पड़ा हुआ देखा। पत्नी को कहीं उसका मोह न जाग पड़े, इसलिए उसने उस कड़े के ऊपर धूल डाल दी।
भगवान इंद्र मजदूरों की इस ईमानदारी से अति प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा - जहां ऐसे कर्मठ और ईमानदार लोग रहते हों, वहां अकाल नहीं रह सकता। उस रात खूब जलवृष्टि हुई और पूरे क्षेत्र का अकाल दूर हो गया।