न्याय का पक्ष
   Date10-Jul-2019

प्रेरणादीप
रा जा जनक अपनी साज-सज्जा के साथ मिथिलापुरी के राजपथ से होकर गुजर रहे थे। उनकी सुविधा के लिए सारा रास्ता पथिकों से शून्य बनाने में राज कर्मचारी लगे हुए थे। राजा की शोभायात्रा निकल जाने तक यात्रियों को अपने आवश्यक काम छोड़कर जहाँ-तहाँ रुका रहना पड़ रहा था। अष्टावक्र को हटाया गया तो उन्होंने हटने से इंकार कर दिया और कहा प्रजाजनों के आवश्यक कार्यों को रोककर अपनी सुविधा का प्रबंध करना राजा के लिए उचित नहीं। राजा अनीति करे तो ब्राह्मण का कर्तव्य है कि उसे रोके और समझाए। सो आप राज्याधिकारीगण राजा तक मेरा संदेश पहुँचाएं और कहें कि अष्टावक्र ने अनुपयुक्त आदेश को मानने से इनकार कर दिया है। राज्याधिकारी कुपित हुए और अष्टावक्र को बंदी बनाकर राजा के पास ले पहुँचे। जनक ने सारा किस्सा सुना तो वे बहुत प्रभावित हुए और कहा जो राजा तक को सत्पथ दिखाने का साहस कर सकें तो वह देश धन्य है। नीति और न्याय के पक्ष में आवाज उठाने वाले सत्पुरुषों के द्वारा ही जनमानस की उत्कृष्टता स्थिर रह सकती है। ऐसे निर्भीक ब्राह्मण राष्ट्र की सच्ची संपत्ति हैं। उन्हें दंड नहीं, सम्मान दिया जाना चाहिए। राजा जनक ने अष्टावक्र से क्षमा माँगी और कहा-मूर्खतापूर्ण आज्ञा चाहे राजा की ही क्यों न हो, तिरस्कार के योग्य है।