ध्यान अमन की अवस्था मन की मृत्यु
   Date10-Jul-2019

धर्मधारा
मो क्ष, हृदय की अविद्यारूपी ग्रंथि के नाश को ही कहते हैं। इसलिए देह अथवा दंड-कमंडलु के त्याग का नाम मोक्ष नहीं है। वृक्ष का सूखकर झड़ा हुआ पत्ता नाली में, नदी में, शिवालय में अथवा किसी चबूतरे पर कहीं भी गिरे, उससे वृक्ष का क्या हानि-लाभ हो सकता है? सचमुच समाधि को प्राप्त मुक्त पुरुषों, बुद्ध पुरुषों की स्थिति भी ऐसी ही होती है। ऐसे ब्रह्मज्ञानी पुरुष जीते हुए भी सदा मुक्त और कृतार्थ ही होते हैं। देह में होते हुए भी सदा अद्वितीय ब्रह्म में ही लीन रहते हैं। ध्यान के नियमित अभ्यास से जब हम इस स्थिति को एक बार प्राप्त कर लेते हैं तब फिर ऐसा नहीं है कि आप इसे करते हैं, तब यह ध्यान है या समाधि है। फिर ऐसा नहीं है कि आप सुखासन, पद्मासन, सिद्धासन आदि किसी निश्चित आसन में बैठते हैं, मेरुदंड सीधी रखते हैं और आप अपनी आँखें बंद रखते हैं, तभी यह ध्यान है। नहीं, ये सब तो केवल प्रयोग हैं, नए लोगों के लिए। ये प्रयोग उनके लिए हैं, जो ध्यान की पहली कक्षा में अभी-अभी आए हैं। जब अंडे तोड़कर चूजे बाहर निकलते हैं, वे कुछ बड़े होते हैं, फिर उनके पंख उग आते हैं, वे अब फुदकते और फडफ़ड़ाते हैं, पर अभी उड़ नहीं पा रहे, तभी माँ, उन्हें उडऩा सिखाती है। जब वे चिडिय़ाँ एक बार उडऩा सीख जाती हैं तो फिर वे पूरे नीलगगन की सैर करके ही वापस आती हैं। फिर उन्हें उडऩा नहीं पड़ता, क्योंकि अब तो उनके पंखों में ही उड़ान जो भर गई है। अब उडऩा, उनका अभ्यास नहीं स्वभाव हो गया। ध्यान भी वैसा ही है। प्रारंभ में यदि आप इसके प्रयोग करते हैं, तो अवश्य करें। ईश्वर के साकार, निराकार रूप, सूर्य, चंद्र, हृदयकमल, आकाश, ईष्ट आदि जहाँ भी, जिसमें भी चित्त लगे-अवश्य लगाएँ, पर यदि निरंतर अभ्यास करते-करते आपने ध्यान में डूबना सीख लिया तो फिर आप किसी ध्येय वस्तु के भरोसे रहते ही नहीं। आप सोते-जागते, चलते-खाते, सबमें सदा ध्यान में ही होते हैं।