दुर्भावना से प्रेरित रिपोर्ट
   Date10-Jul-2019

भारत ने जम्मू-कश्मीर की रिपोर्ट को लेकर मानवाधिकार उच्च आयुक्त कार्यालय की आलोचना की। विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रवीश कुमार ने कहा कि कश्मीर की स्थिति को लेकर यह रिपोर्ट झूठी और दुर्भावना पूर्ण है। इसमें पाकिस्तान द्वारा प्रायोजित आतंकवाद की अनदेखी की गई है। इस रिपोर्ट की बात देश की प्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता का हनन करती है। रिपोर्ट में सीमा पर आतंक के मुद्दे को भी अनदेखा किया गया है। वैसे मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट का कोई महत्व नहीं है। हर देश की अपनी समस्या है। उनसे निपटने के प्रयास को मानवाधिकार आयोग बेकार का अड़ंगा डालना है। मानवाधिकार आयोग के पास ऐसी एजेंसी भी नहीं है, जिसमें सच्चाई का पता लगा सके। इस आयोग को पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद दिखाई नहीं देता, जो आए दिन निर्दोषों का खून बहाता है। भारत करीब तीन दशक से इस आतंकवाद से जूझ रहा है। मानवाधिकार आयोग को उरी-पुलवामा के घटनाक्रम की भी शायद जानकारी नहीं है, जिसमें कई निर्दोष जवानों का खून बहा। मानवाधिकार आयोग की रिपोर्ट कूड़ेदान में फैंकने लायक है। इस आयोग को किसने अधिकार दिए, जो भारत की संप्रभुता और अखंडता में हस्तक्षेप करे। कश्मीर की स्थिति को नियंत्रित करने में राष्ट्रसंघ भी बाधक रहा है। इस प्रकार की रिपोर्ट आतंकवाद की ही पैरोकार है। इन दिनों अमरनाथ यात्रा की सुरक्षा के कड़े प्रबंध किए गए हैं। मेहबूबा मुफ्ती और अब्दुल्ला वैसे ये दोनों परिवार जम्मू-कश्मीर को अपनी जागीरी मानते हैं। इनकी आवाज ही कश्मीर की आवाज है, इस कारण भी कश्मीर की स्थिति बिगड़ी है। जिस तरह नेहरू-गांधी परिवार करीब पचास वर्ष तक केन्द्रीय सरकार पर काबिज रहा, यही परिवार देश की समस्याओं के जड़ में है, इसी तरह कश्मीर की स्थिति को बिगडऩे और अलगाववादी, देशद्रोहियों को गले लगाने में अब्दुल्ला और मुफ्ती परिवार आगे रहा है। अब इनको आपत्ति यह है कि अमरनाथ यात्रियों की सुरक्षा के कारण घाटी के लोग परेशान है, हाईवे को रोकने से परेशानी हो रही है। सवाल यह है कि क्या अब्दुल्ला-मुफ्ती यह चाहते हैं कि अमरनाथ यात्रियों की सुरक्षा-व्यवस्था शिथिल करके आतंकियों को खून खराबा करने का अवसर मिल जाए। कश्मीरियों की यह परेशानी दिखाई नहीं देती, जब आतंकी बुरहानवानी की बरसी पर हुर्रियत द्वारा बंद का ऐलान किया गया। इस बारे में जानना होगा कि आतंकी बुरहान तीन साल पहले आठ जुलाई को सुरक्षा बलों के द्वारा मारा गया था। विडंबना यह है कि कश्मीर के अलगाववादी, जो भारत में रहकर संवैधानिक अधिकार और सुविधाओं का उपयोग करते हैं और कश्मीरियत का राग अलापते रहते हैं। ये अपने आपको भारतीय मानने को तैयार नहीं। बुरहानवानी आतंकवादी को आतंकवादी मानने को तैयार नहीं है। कश्मीर के स्वर्ग को नर्क बनाने में आतंकियों, अलगाववादियों का हाथ रहा है। इसलिए इनकी अनदेखी कर जम्मू-कश्मीर के बारे में कठोर निर्णय का समय है।
दृष्टिकोण
35 (ए) खत्म करो
1948 से ही जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने से स्थिति बिगड़ती गई। इतिहास की सच्चाई यह है कि कश्मीर समस्या के मूल में पं. नेहरू की राष्ट्रविरोधी नीति रही है। शेख अब्दुल्ला की दोस्ती के जाल में फंसकर कश्मीर को अलग दर्जा देने वाली अस्थाई धारा का प्रावधान रखा गया। इसके बाद इस धारा के साथ धारा 35(ए) की पूंछ लगा दी गई। आतंकवाद और अलगाववाद भी विशेष दर्जा देने के कारण पैदा हुआ। पं. नेहरू ने ही कश्मीर के मामले को राष्ट्रसंघ में उलझाया। कबाइली हमलावरों को जब भारतीय सेना खदेडऩे लगी तो पं. नेहरू द्वारा युद्ध विराम करने से एक तिहाई हिस्से पर पाकिस्तान काबिज हो गया। अब स्थिति में व्यापक बदलाव हुआ है। कश्मीर घाटी के मुट्ठीभर लोगों के अलावा पूरा देश चाहता है कि अस्थाई धारा 370 के प्रावधान को खत्म किया जाए। 35(ए) तो राष्ट्रपति के आदेश से समाप्त हो सकती है। इस मामले में यदि तुरंत निर्णय नहीं लिया गया तो स्थिति और बिगड़ जाएगी। हालांकि लोकसभा में जब धारा 370 को लेकर विपक्ष की ओर से सवाल किया तो गृहमंत्री अमित शाह ने जोर की आवाज में कहा कि यह ध्यान रखें की धारा 370 एक अस्थाई धारा है। इसे समाप्त करने में संवैधानिक प्रक्रिया को पूरा करने में कठिनाई हो सकती है, लेकिन 35(ए) तो राष्ट्रपति के द्वारा समाप्त की जा सकती है। केबिनेट में निर्णय लेकर 35(ए) को समाप्त किया जा सकता है। इससे भारत का हर नागरिक कश्मीर में जाकर व्यापार-व्यवसाय कर सकेगा। कश्मीर के विकास के लिए भी यह जरूरी है, कश्मीर के युवकों के सामने रोजगार के अवसर नहीं होने से भी युवक मजहबी जुनून में फंसकर आतंक के रास्ते पर चले जाते हैं। फिर बुरहानवानी जैसे आतंकी पैदा होते हैं।