सांस्कृतिक चेतना के पुरोधा स्वामी सत्यमित्रानंद गिरि
   Date01-Jul-2019

धर्मधारा
(गतांक से आगे)
29 अप्रैल, 1960 को अक्षय तृतीया के दिन स्वामी करपात्रीजी के निर्देशन में ब्रह्मचारी सत्यमित्रानंदजी को ज्योतिर्मठ भानपुरा पीठ के शंकराचार्य स्वामी सदानंद गिरिजी महाराज ने संन्यास आश्रम में दीक्षित कर जगद्गुरु शंकराचार्य पद पर प्रतिष्ठित किया और यहीं से शुरू हुई स्वामी सत्यमित्रानंदजी की देश के ग्राम-ग्राम में दीन दुखियों, गिरि-आदिवासी-वनवासी की पीड़ा से साक्षात्कार की यात्रा। प्रख्यात चिकित्सक स्व. डॉ. आर.एम. सोजतिया से निकटता के चलते भानपुरा क्षेत्र में उन्होंने अति निर्धन लोगों के उत्थान की दिशा में अनेक कार्य किए। उन्होंने 1969 में स्वयं को हिन्दू धर्म के सर्वोच्च पद शंकराचार्य से मुक्त कर गंगा में दंड का विसर्जन कर दिया और तब से वे केवल परिव्राजक संन्यासी के रूप में देश-विदेश में भारतीय संस्कृति व अध्यात्म के प्रचार-प्रसार में संलग्न रहे। पद विसर्जन की यह घटना अनसोचा, अनदेखा, अनपढ़ा कालजयी आलेख बना। पदलिप्सा की अंधी दौड़ में धर्मगुरु भी पीछे नहीं हैं। इसमें उनकी साधना, संयम, त्याग, तपस्या और व्रत सभी कुछ पीछे छूट जाते हैं। ऐसे समय में स्वामीजी द्वारा किया गया पद विसर्जन राजनीति और धर्मनीति की जीवनशैली को नया अंदाज दे गया। समन्वय-पथ-प्रदर्शक, अध्यात्म-चेतना के प्रतीक, भारत माता मन्दिर से प्रतिष्ठापक स्वामी सत्यमित्रानन्द गिरिजी को 27 वर्ष की अल्प आयु में ही शंकराचार्य-पद पर अभिषिक्त होने का गौरव प्राप्त हुआ। वे लगातार दीन-दुखी, गिरिवासी, वनवासी, आदिवासी, हरिजनों की सेवा और साम्प्रदायिक मतभेदों को दूर कर समन्वय-भावना का विश्व में प्रसार करने के लिए प्रयासरत रहे। उनकी उल्लेखनीय सेवाओं के लिए भारत सरकार ने वर्ष 2015 में उन्हें पदम् भूषण से सम्मानित किया। गत दिनों विज्ञान भवन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक श्री मोहन भागवत के विशेष व्याख्यान सहित अनेक अवसरों पर मुझे उन्हें सुनने का अवसर मिला। (समाप्त)