आतंकवाद के खिलाफ चक्रव्यूह
   Date01-Jul-2019

आतंकवाद के खिलाफ भारत के अंदर और बाहर युद्ध चल रहा है। अंतर यह है कि भारत के अंदर आतंकवाद के खिलाफ नो टॉलरेंस की नीति के साथ आतंकवाद के समर्थकों एवं दुश्मन देश के द्वारा भारत के अंदर के युवकों को मजहबी जुनून से प्रेरित किया जाता है, उनके द्वारा सुरक्षा बलों पर पत्थर बरसाए जाते हैं। ऐसे देशद्रोहियों के खिलाफ भी नो टॉलरेंस की कार्रवाई मोदी सरकार द्वारा की जा रही है। अब ऐसे संगठनों को भी प्रतिबंधित किया जा रहा है, जो देशद्रोही गतिविधियां चलाते हैं। जमाते इस्लामी संगठन पर बंदिश लगा दी है। उसके नेताओं के खिलाफ एनआईए की जांच शुरू हो गई है। कई को हिरासत में लेकर जेल में डाल दिया गया है। इस नो टॉलरेंस नीति से सेना का मनोबल बढ़ा है। घुसपैठिये मारे जा रहे हैं। पत्थरबाजों के हाथों से पथराव की बारिश में कमी आई है। हाल ही में गृहमंत्री अमित शाह ने कश्मीर घाटी का दौरा किया। जब भी कोई केन्द्रीय मंत्री घाटी में पहुंचता था तो बंद का ऐलान कर अलगाववादी हिंसा की आग लगाने की साजिश करते थे, लेकिन अब अलगाववादियों पर मोदी सरकार का खौफ इतना हो गया है कि वे अपने बचाव का रास्ता तलाशने लगे हैं। दूसरी ओर प्रधानमंत्री मोदी ने जी-20 के शिखर सम्मेलन में जाकर न केवल आतंकवाद के खिलाफ दुनिया के सामने आतंकवाद के बारे में कहा कि चाहे मजहबी हो या जातीय मानव जीवन के लिए खतरा है। आतंकवाद बेड या गुड वही होता है, आतंकवाद केवल आतंकवाद होता है। प्रधानमंत्री ने इस बात को प्रमुखता से प्रस्तुत करते हुए कहा कि आतंकवाद के खिलाफ एकजुट होकर मुकाबला करना होगा। उस देश के खिलाफ भी कार्रवाई होना चाहिए, जो आतंकवाद द्वारा प्रायोजित होता है। श्री मोदी का संकेत पाकिस्तान की ओर था। पहली बार जनता के सामने इतिहास की यह सच्चाई सामने आ रही है कि कश्मीर की समस्या की जड़ में कौन है? इस बारे में लोकसभा में गृहमंत्री अमित शाह ने कांग्रेस सदस्य मनीष तिवारी के सवाल पर कश्मीर के बारे में 1947 से अब तक के इतिहास के पन्ने पलटकर रख दिए। 1947 में अर्थात् आजादी के बाद पहले प्रधानमंत्री पं. जवाहरलाल नेहरू ने शेख अब्दुल्ला की दोस्ती के चक्कर में पड़कर कश्मीर की अलग पहचान के लिए धारा 370 का अस्थाई प्रावधान संविधान में शामिल किया गया। कश्मीर के मामले को राष्ट्र संघ के चार्टर में शामिल कर उलझाने से कश्मीर समस्या न होते हुए भी समस्या हो गई। इस समस्या में से ही आतंकवाद पनपा और पाकिस्तान मजहबी आधार पर कश्मीर पर दावा करने लगा। कूटनीतिक क्षेत्र में भी अपनी बात को अंतर्राष्ट्रीय मंच पर इसलिए समर्थन नहीं मिला कि अमेरिका ने पाकिस्तान की नीति का समर्थन किया। अब स्थिति ने यू टर्न लिया है। अमेरिका, रूस, ब्रिटेन, जापान आदि महाशक्तियां भारत के समर्थन में खड़ी है।
दृष्टिकोण
नई कांग्रेस के लिए !
कांग्रेस की करारी हार से कांग्रेस अभी तक स्थिर नहीं हो पाई है, जिस तरह इंदिराजी ने सिंडीकेट के वरिष्ठ नेताओं से परेशान होकर कांग्रेस का विभाजन कर अपनी स्थिति को मजबूत किया, उस समय की कांग्रेस में इंदिराजी का प्रभावी नेतृत्व था। केन्द्र, राज्य और पंचायतों तक कांग्रेस का वर्चस्व था, इसलिए अधिकांश कांग्रेसी इंदिराजी की छतरी के नीचे आकर इंदिरा इज इंडिया की बोली बोलने लगे। इंदिराजी के आसपास भी चाटूकारों का घेरा बन गया। इंदिराजी 1977 की स्थिति से बाहर होकर पुन: सरकार पर वर्चस्व कायम करने में सफल हो गई। आज सोनिया-राहुल और प्रियंका वाड्रा के सिंडीकेट का कांग्रेस पर वर्चस्व है, जबसे कांग्रेस की कमान राहुल को सौंपी गई, तभी से विधानसभा नगर निगमों से लेकर लोकसभा चुनाव में राहुल के नेतृत्व में कांग्रेस को एक के बाद एक पराजय का सामना करना पड़ा। 2019 के लोकसभा चुनाव में भी कांग्रेस मान्यता प्राप्त दल का दर्जा प्राप्त नहीं कर सकी। 18 राज्यों में कांग्रेस का पूरी तरह सफाया हो गया। केन्द्र में मोदी सरकार पहले से अधिक बहुमत के साथ स्थापित हो गई। विडंबना यह है कि एक माह बाद भी कांग्रेस अपने घावों के दर्द से कराह रही है, यह भी स्थिति है कि कांग्रेस आईसीयू से बाहर नहीं निकल सकी है। राहुल गांधी का इस्तीफा देने के बाद भी हार के जिम्मेदार नेताओं ने इस्तीफा नहीं दिया। अब कांग्रेस के संगठन के तनखा आदि नेताओं ने इस्तीफा दे दिया। उत्तर प्रदेश के कांग्रेस पदाधिकारियों के इस्तीफा देने का सिलसिला चल रहा है। संवैधानिक पद पर बैठे पदों से किसी ने इस्तीफे नहीं दिए है। पंजाब के वरिष्ठ नेता बाजवा ने मांग की है कि सभी मुख्यमंत्रियों को भी अपने पद से इस्तीफा देकर राहुल के नेतृत्व में न्यू कांग्रेस के गठन के लिए खुली आजादी मिलनी चाहिए।