आक्रांताओं की महिमा से मुक्त हो पाठ्यक्रम...
   Date09-Jun-2019
शक्तिसिंह परमार
भा रतीय विचार में तो वैसे हर दिन को पावन रूप में देखा जाता है, क्योंकि वर्ष के 365 दिनों में इस भारतभूमि पर हर दिन कहीं न कहीं किसी महापुरुष ने जन्म लिया और मातृभूमि की सेवा में अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया... समाज-राष्ट्र के निर्माण में उनका योगदान अतुल्यनीय और सहों वर्ष तक प्रेरणा देने वाला और स्मरण करने वाला रहेगा... क्योंकि उनका कर्मपथ समाज-राष्ट्र के लिए चिरस्थायी व प्रेरणापुंज है, जो सदैव टिमटिमाकर भी तीनों लोकों को आलोकित करता है... किसी भी समाज-राष्ट्र का इतिहास, परंपरा, कार्य-नीति, विचार और संस्कृति ही उसकी नींव के ऐसे मजबूत पत्थर हैं, जिन पर वह एक लंबी यात्रा तय करते हुए विश्व का मार्गदर्शन करने में सफल होती है... भारत का गौरवशाली इतिहास आज भी दुनिया को चकित कर रहा है... क्योंकि 5-6 हजार साल पुरानी यह भारत की संस्कृति, इसकी सभ्यता, इसके संस्कार और विचार आज भी समाज-राष्ट्र के निर्माण में अपना अहम योगदान दे रहे हैं... सही मायने में वही समाज-राष्ट्र अपने जीवन को चिरस्थायी बना सकता है, जो इतिहास से सीख लेकर, इतिहास से सबक लेकर और इतिहास पर गर्व करके अपने को उसी दिशा में आगे बढ़ाने के हर संभव प्रयास करता है... और ऐसे इतिहास का दर्शन कराने का काम हमारे वे महान संत-महात्मा, स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, शहीद एवं विविधतापूर्ण क्षेत्रों से जुड़े महान पुरुष करते हैं... जो अपने विचारों-कार्यों के जरिये अपना पीछे एक लंबा गर्विल इतिहास छोड़ गए हैं...उस इतिहास का समय-समय पर स्मरण, अध्ययन और उसको आत्मसात करके ही हम अपनी गौरवशाली परंपराओं का निर्वाह निर्बाध कर सकते हैं...
भारतीय मास के मान से ज्येष्ठ/आषाढ़ और अंग्रेजी कैलेंडर के मान से जून माह अनेक क्रांतिकारियों, साहसिक योद्धाओं, वीरों और वीरांगनाओं के साथ ही महान आत्माओं के जन्म व निर्वाण का साक्षी है, जिनका कर्मपथ आज भी मनुष्यमात्र का पथ प्रदर्शन कर रहा है... ग्रहों के मान से देवता माने जाने वाले शनि भगवान की जयंती भी इसी माह में आती है... मनुष्यमात्र को एकता के सूत्र में जोडऩे वाली मां गायत्री की जयंती भी है... संयोग से गंगा दशहरा भी इसी दिन आ रहा है... 6 जून को हम महाराणा प्रताप और छत्रसाल जयंती, 7 जून को गुरु अर्जुन देव की पुण्यतिथि मनाई... 8 जून को सांई टेऊंराम का पुण्य स्मरण दिवस... 9 जून को वनवासी योद्धा बिरसा मुंडा का शहीद दिवस है और 18 को लक्ष्मीबाई बलिदान दिवस और 24 को रानी दुर्गावती बलिदान दिवस है...यानी प्रेरणा पुरुषों से ओतप्रोत है यह जून का महीना...
हल्दी घाटी का युद्ध आज भी हमें अपनी संस्कारों, संस्कृति एवं मूल्यों के साथ ही ऐतिहासिक भारतीय विरासत को हर कीमत पर बचाए रखने, उसे निरंतर संरक्षित व संवद्र्धित करने की सीख देता है और इस सीख के प्रणेता है महाराणा प्रताप... जिन्होंने विदेशी, मुस्लिम आक्रांता अकबर से सालों लोहा लिया... हल्दी घाटी युद्ध चला तो सिर्फ एक दिन, लेकिन इसमें 17 हजार लोग मारे गए... मेवाड़ को जीतने के लिए अकबर ने अपनी सारी साजिशों के जाल बुने, लेकिन वह महाराणा प्रताप के शौर्य-पराक्रम के आगे बोना ही साबित हुआ... महाराणा प्रताप का जीवनवृत्त आज भी देशभर के युवाओं को अपने संस्कृति, सभ्यता को प्राणों की बाजी लगाकर भी बचाने की सीख देता है... महाराज छत्रसाल ने तो भारत के मध्ययुग के एक प्रतापी योद्धा के रूप में औरंगजेब को नाको चने चबवाए... उन्हें बुंदेलखंड केशरी के नाम से भी पहचाना जाता है... उनके विषय में ये पंक्तियां विख्यात थीं-
इत यमुना, उत नर्मदा, इत चंबल, उत टोंस।
छत्रसाल सों लरन की, रही न काहू हौंस॥
छोटा नागपुर में मुंडा परिवार में जन्में वीर योद्धा बिरसा मुंडा ने अपने युवा जीवन में ही अंग्रेजी सल्तनत की चूल्हें हिला दी थी... उन्होंने अपने वनवासी बंधुओं को संगठित करने के साथ ही ब्रिटिश सरकार की दास्तां से मुक्ति पाने के लिए छोटे-छोटे युद्ध के जरिये लोगों को न केवल आजादी प्राप्ति के लिए मानसिक रूप से तैयार किया, बल्कि वनवासी समाज में भी आजादी के मूल्य को स्थापित करने में महती भूमिका निभाई... 1894 में भयंकर अकाल व महामारी फैलने के चलते लोगों को बचाने के प्रयास में यह भारत मां का सपूत अपने प्राणों को राष्ट्र यज्ञ में आहुत कर गया...
मैं अपनी झांसी अंग्रेजों को नहीं दूंगी, इस हुंकार के साथ वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई ने भारत के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम 1857 का महज 29 साल की उम्र में शंखनाद कर दिया था... मराठा शासित झांसी राज्य की रानी के साथ ही उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम की योद्धा के रूप में भी अपने जीवन को समाज-राष्ट्र के लिए समर्पित कर दिया... सुभद्रा कुमारी चौहान ने रानी लक्ष्मीबाई के लिए लिखा था-
बुंदेले हरबोलों के मुंह हमने सुनी कहानी थी,
खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी।।
भारत की एक और वीरांगना रानी दुर्गावती (जन्म 5 अक्टूबर 1524, निर्वाण 24 जून 1564) ने अपने विवाह के 4 वर्ष बाद ही पति दलपत शाह की असमय मृत्यु के बाद अपने पुत्र वीर नारायण को सिंहासन पर बैठाकर संरक्षण के रूप में स्वयं ने शासन प्रारंभ किया... इस दौरान उन्हें मुगलों व अंग्रेजों के साथ ही अन्य आक्रमणकारियों से लोहा लेना पड़ा... रानी दुर्गावती ने अनेक मठ, कुएं, तालाब, धर्मशालाएं बनाई और उनके राज्य का केन्द्र जबलपुर था, जहां पर उन्हें पूरे सम्मान के साथ याद किया जाता है... अर्जन देव या गुरु अर्जुन देव ( जन्म - 15 अप्रैल 1563, निर्वाण - 30 मई 1606) सिखों के 5वें गुरु थे... गुरु अर्जुन देव जी शहीदों के सरताज एवं शान्तिपुंज हैं... आध्यात्मिक जगत में गुरुजी को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है... उन्हें ब्रह्मज्ञानी भी कहा जाता है... गुरुग्रंथ साहिब में तीस रागों में गुरु जी की वाणी संकलित है... गणना की दृष्टि से श्री गुरुग्रंथ साहिब में सर्वाधिक वाणी पंचम गुरु की ही है...
स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों, त्याग-बलिदान की प्रतिमूर्ति वीर और वीरांगनाएं प्रात: स्मरणीय तो ही है, लेकिन क्या इनके स्मरण मात्र से हम उनके सपनों का भारत बनाने में सफल हो सकते हैं... इस बात का विचार हमारे वीर शहीदों, राष्ट्र नायकों, महान आत्माओं, संतों, प्रेरणा पुरुषों और समाज सुधारकों की जयंती-पुण्यतिथि के साथ ही उनके स्मरण दिवस पर होना चाहिए... क्योंकि जब हम असंख्य वीरों और शहीदों को याद भी नहीं कर पा रहे हैं, तब इन गिने-चुने शहीदों के जीवनवृत्त को भी युवा पीढ़ी तक कहां पहुंचा पा रहे हैं..? सिर्फ इनकी प्रतिमाओं पर माल्यार्पण करने, दूध से शुद्धि करने से काम नहीं चलेगा... बल्कि अब समय की मांग है कि जब राष्ट्रवाद के नाम पर एक निर्णायक बहुमत के साथ इंद्रप्रस्थ पर भाजपा आरूढ़ भी है, तो क्यों न उन विदेशी आक्रांताओं, मुस्लिम शासकों, बर्बर आतताइयों का जो महिमामंडन कर 70 सालों तक भारतीय शिक्षा के पाठ्यक्रमों में शान के साथ पढ़ाया जाता रहा है, उससे मुक्ति का मार्ग अब तुरंत प्रशस्त नहीं होना चाहिए..? सही मायने में जिन-जिन विदेशी आक्रांताओं को महान बताकर हमारे पाठ्यक्रम में हमारे ही नायकों को जो लुटेरा और डरपोक बताने की कोशिश की गई, उससे मुक्त होकर भारतीय नायकों का एक वृहद पाठ्यक्रम शिक्षा में शामिल हो... तभी उनके सपनों का भारत युवा पीढ़ी के दिलो-दिमाग में उतर सकेगा...