धरती के बढ़ते तापमान पर नियंत्रण जरूरी
   Date08-Jun-2019
धर्मधारा
आज संपूर्ण विश्व के लिए ग्लोबल वार्मिंग एक गंभीर समस्या बन चुकी है। हालांकि दुनिया के कई देशों और उनके नेतृत्व द्वारा इस समस्या से निपटने की दिशा में अनेकानेक प्रयास भी किए गए हैं, जिनमें वैश्विक स्तर पर इस उद्देश्य हेतु आयोजित सभा-सम्मेलन शामिल हैं, इन सम्मेलनों में बढ़ते हुए तापमान पर नियंत्रण पाने के लिए कई प्रस्ताव भी पारित किए गए, लेकिन इस दिशा में कोई सार्थक परिणाम तब भी सामने नहीं आ सका। पेरिस सम्मेलन इसका एक अच्छा उदाहरण है, लेकिन इन सबके बावजूद वर्तमान हालात समस्या की भयावहता की ओर ही इशारा कर रहे हैं, क्योंकि जलवायु-परिवर्तन के दुष्प्रभावों से निपटने की लाख कोशिशों के बावजूद धरती का तापमान लगातार बढ़ रहा है। धरती के तापमान में बढ़ोतरी का सबसे अधिक दुष्प्रभाव दक्षिण एशिया के देशों, विशेषकर भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश पर पड़ेगा। देखा जाए तो विशेषकर इन्हीं तीन देशों में दुनिया के 20 फीसद से अधिक आर्थिक दृष्टि से निम्नस्तर के लोग रहते हैं, जो कि सीधे तौर पर इस आपदा का मुकाबला कर पाने में समर्थ नहीं होंगे। मैसाच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के वैज्ञानिकों के अनुसार धरती के तापमान में बढ़ोतरी की अवस्था भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के लिए अधिक चिंताजनक है, क्योंकि इन देशों में अधिकांश आबादी के हिस्से का कार्य कृषि से संबंधित है और कृषि का कार्य सीधे-सीधे जलवायु से प्रभावित होता है। इस वजह से उन देशों जहां के लोग कृषि कार्यों से दूर कृत्रिम वातावरण में रहते हैं, उनके कारण भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश के कृषि उत्पादन पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। इसी के साथ मानवीय गतिविधियों के कारण होने वाले कार्बन-उत्सर्जन से चावल, गेहूं और अन्य मुख्य अनाजों की पोषकता में कमी आने का खतरा भी मंडरा रहा है। ऐसी स्थिति में दुनिया की एक बहुत बड़ी आबादी प्रोटीन की कमी से जूझेगी। वैज्ञानिकों ने यह चेताया भी है कि कार्बन-डाईऑक्साइड के उत्सर्जन का स्तर आने वाले सालों में यदि इसी तरह बढ़ता रहा तो सन् 2050 तक दुनिया के 18 देशों की आबादी के भोजन में मौजूदा प्रोटीन के स्तर में 5 फीसदी तक की कमी हो सकती है। अमेरिका के हार्वर्ड टीएच चान स्कूल ऑफ पब्लिक हेल्थ के अध्ययन के अनुसार वातावरण में कार्बन डाईऑक्साइड के लगातार बढ़ते स्तर के कारण दुनिया में 15 करोड़ अतिरिक्त लोगों में प्रोटीन की कमी के खतरे की आशंका को नकारा नहीं जा सकता। इसमें कोई दो राय नहीं कि वैश्विक स्तर पर दुनिया की तकरीबन 76 फीसद आबादी प्रोटीन की जरूरतों को फसलों से ही पूरा करती है, फिर जब फसलों पर ही खतरा मंडरा रहा हो, उस स्थिति में आबादी के लिए प्रोटीन की उम्मीद करना औचित्यहीन हो जाता है।