चुनौती और अपेक्षाओं के बीच मोदी के हाथ सत्ता की डोर
   Date08-Jun-2019
डॉ. विजय सोनकर शास्त्री
2019 का जनादेश बहुत बड़ा है। इसलिए केंद्र की नई सरकार के सामने चुनौतियां भी बड़ी हैं, पर जो लोग प्रधानमंत्री मोदी की कार्यप्रक्रिया के जुनून को जानते हैं, वह कहते हैं- 'मोदी है, तो मुमकिन हैÓ। 23 मई 2019 दिन-बृहस्पतिवार। लगभग 130 करोड़ लोगों वाले देश भारत में यह महज एक तिथि नहीं है, बल्कि यह वह दिन है, जो इतिहास में इसलिए दर्ज किया जाएगा कि अपनी विकासपरक नीतियों के दम पर आम चुनाव में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने दोबारा भारी बहुमत से जीत प्राप्त की। यह जीत इसलिए भी ऐतिहासिक मानी जाएगी, क्योंकि पूरा विपक्ष प्रधानमंत्री मोदी को आम चुनाव में हराने के लिए एकजुट होकर अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर रहा था। चुनाव के मध्य भाजपा नेता प्रधानमंत्री नरेंद्र नरेंद्र मोदीजी पर लगातार वार किए जा रहे थे और गलत आरोपों से उनकी छवि को जनता के मध्य तार-तार करने के लिए हर विपक्षी नेता सबसे आगे नजर आ रहा था, लेकिन विपक्ष के तमाम प्रयास और दावों को चुनाव परिणाम ने हवा में उड़ा दिया और प्रधानमंत्री मोदी भारी बहुमत के साथ जीतकर विजेता के रूप में सामने आए।
भाजपा नेता नरेंद्र मोदी को आम चुनाव में मिली प्रचंड जीत के पीछे छिपे कारणों पर ध्यान दिया जाए तो यह स्पष्ट नजर आता है कि 2014 से लेकर 2019 के मध्य अपने पहले कार्यकाल में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जिस तरह देश की गरीब, दलित और वंचित जनता की मूल आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए दिन-रात काम किया, उसका परिणाम चुनाव में जनता से मिले भारी समर्थन के रूप में देखा गया। प्रधानमंत्री मोदी के शब्दों में कहें तो पांच साल के दौरान उन्होंने देश की मजबूत नींव को तैयार किया है, जिस पर अब भव्य इमारत बनाने का काम किया जाएगा। आशय यह है कि प्रधानमंत्री मोदी ने अपने पहले कार्यकाल में देश की गरीब, दलित और वंचित जनता के उन हितों एवं मौलिक आवश्यकताओं को पूरा करने का काम किया, जिन हितों या सुविधाओं की तरफ, स्वतंत्रता के बाद बनाने वाली अधिकांश सरकारों ने न तो ध्यान दिया और न ही विचार किया। लेकिन प्रधानमंत्री मोदी ने जिस गंभीरता के साथ इन हितों को सोचा, समझा और फिर काम किया, उसका परिणाम विकास की दौड़ में आगे बढ़ रहे भारत के रूप में देखा जा सकता है। अब एक बार फिर जब जनता ने लोकसभा चुनाव में प्रधानमंत्री मोदी को फिर से स्थायी और मजबूत सरकार बनाने का जनादेश दे दिया है। नए जनादेश में भारत की जनता की उस आशा, विश्वास और अपेक्षाओं को भी देखा जा सकता है, जिसके सपने उनकी आंखों में सजे हुए हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी की जिम्मेदारी बन जाती है कि वह हर भारतवासी के शैक्षणिक, आर्थिक और सामाजिक हितों के अनुरूप अपनी सरकार की दिशा को निर्धारित करें, जिससे देश का हर नागरिक, वह चाहे दलित हो या गरीब, वंचित हो या कमजोर, सभी अपने जीवन की मूल आवश्यकताओं की पूर्ति निर्बाध रूप से करते हुए अपना और अपने परिवार का जीवनयापन कर सकें। अबकी बार का जनादेश बहुत बड़ा है। इसलिए केंद्र की नई सरकार के सामने चुनौतियां भी बड़ी हैं, पर जो लोग प्रधानमंत्री मोदी की कार्यप्रक्रिया के जुनून को जानते हैं, वह कहते हैं- 'मोदी है, तो मुमकिन हैÓ। इसलिए प्रधानमंत्री मोदी पर सभी का विश्वास है कि वह भारत की पूरी तस्वीर को बदलकर रख देंगे। आगामी पांच साल के कार्यकाल के दौरान भारत को विकास के पथ पर और आगे ले जाने के लिए नई सरकार को शैक्षणिक, आर्थिक और सामाजिक रूप से जो काम करने होंगे, उस पर इस तरह से विचार किया जा सकता है। शिक्षा किसी भी देश के निर्माण का महत्वपूर्ण अंग होती है। शिक्षा हर मानव में संस्कार को जन्म देती है और संस्कार से मानव समाज का सकारात्मक विकास प्रशस्त होता है। यह वाक्य हजारों साल पुरानी भारतीय हिन्दू संस्कृति की परंपरा को दर्शाता है। प्राचीन काल में गुरुकुलों, आश्रमों तथा बौद्ध मठों में शिक्षा ग्रहण करने की व्यवस्था होती थी। नालंदा, तक्षशिला एवं वल्लभी जैसे शिक्षा केंद्रों की पहचान विश्व स्तर पर थी और विदेशी छात्र भी भारत में शिक्षा के लिए आते थे। लेकिन समय के साथ ऐसे कई शिक्षा केंद्र नष्ट कर दिए गए। मुगलकाल से लेकर अंग्रेजों के समय आने तक शिक्षा का स्वरूप बदलता चला गया। अंग्रेजों के काल में शिक्षा की जिस आधुनिक प्रणाली की शुरुआत हुई, उस प्रणाली ने शिक्षा को आमजन से दूर करने का काम किया। भारत को जब स्वतंत्रता मिली तो देश की सरकारों ने शिक्षा के लिए काम तो किया, लेकिन शिक्षा से आम जनमानस को जोड़ पाने में असफल ही रहे। उनकी असफलता के कारण गरीब, दलित और वंचित समाज शिक्षा से दूर होता चला गया। राजनीति और वोट बैंक की मानसिकता ने सरकारी स्कूलों में मिलने वाली शिक्षा की गुणवत्ता लगातार कम की, परिणाम निजी शिक्षा केंद्रों को धन आधारित शिक्षा के रूप में देखा गया। सभी को शिक्षा देने के लिए कानून भी बनाया गया, लेकिन आम जनमानस के बच्चे गुणवत्तायुक्त शिक्षा से दूर ही रहे। देश की नई मोदी सरकार के सामने शिक्षा क्षेत्र के आमूलचूल परिवर्तन की चुनौती भी है। खासतौर पर गरीब, दलित और वंचित समाज के बच्चों के लिए गुणवत्तायुक्त और रोजगारपरक शिक्षा देने के लिए बड़े कदम उठाने की आवश्यकता है। इसके लिए सरकारी स्कूलों में शिक्षा के स्तर को तो सही करना ही होगा, साथ ही उन निजी और महंगे स्कूलों पर भी नकेल कसनी होगी, जिनके लिए शिक्षा सिर्फ धन कमाने के साधन से ज्यादा और कुछ नहीं है। गुणवत्तायुक्त और रोजगारपरक शिक्षा को उच्च वर्गों के माध्यम से निम्न वर्गों तक पहुंचना होगा। देश में जब शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू हुआ तो 6 से 14 वर्ष के बच्चों के लिए यह मौलिक अधिकार बन गया। इसके बावजूद शिक्षा के क्षेत्र में चुनौतियों का अंबार लगा है तथा ऐसे उपायों की तलाश लगातार जारी है, जिनसे इस क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन लाए जा सकें। मानव संसाधन के विकास का मूल शिक्षा है, जो देश के सामाजिक-आर्थिक तंत्र के संतुलन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। हमारे देश का शिक्षा क्षेत्र शिक्षकों की कमी से सर्वाधिक प्रभावित है, साथ ही राज्यों द्वारा चलाए जाने वाले शिक्षा सुधार कार्यक्रम भी कोई खास उम्मीद नहीं जगा पाए हैं। वर्तमान में विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में प्रोफेसरों की जवाबदेही और प्रदर्शन सुनिश्चित करने का कोई फार्मूला नहीं है। देश के शिक्षा संबंधी सभी अध्ययन इंगित करते हैं कि शिक्षा के साथ विद्यार्थियों का स्तर भी अपेक्षा से नीचे है। इसके लिए सीधे शिक्षकों को दोषी ठहरा दिया जाता है और इस वास्तविकता से आंख बंद कर ली जाती है कि शिक्षा का बुनियादी ढांचा और शिक्षकों के प्रशिक्षण की व्यवस्था बेहद कमजोर है। देश में एक लाख से अधिक विद्यालय ऐसे हैं, जहां केवल एक शिक्षक है। आजादी के 72 वर्ष बाद भी यदि देश में शिक्षा की यह दशा और दिशा है तो स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार के सकारात्मक अभियान में सभी का सक्रिय सहयोग लेना आवश्यक होगा। आर्थिक असमानता की बड़ी वजह मैकाले की शिक्षा नीति है, जो आम लोगों और संभ्रांत वर्ग के बीच फासले को बरकरार रखने के लिए तैयार की गई थी। मौजूदा शिक्षा व्यवस्था में क्या खामी है और नई शिक्षा व्यवस्था कैसी होनी चाहिए? मैकाले ने अंग्रेजी शासन को कायम रखने के लिए संभ्रांत वर्ग तैयार करने वाली शिक्षा नीति को बढ़ावा दिया। स्वतंत्रता के बाद भी आधुनिकता के नाम पर यही नीतियां अपनाई गई। इससे समाज में शिक्षा के स्तर पर असमानता बढ़ी। अमीर अच्छी शिक्षा हासिल कर आर्थिक तौर पर सम्पन्न होने लगे और गरीब पैसे के अभाव में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा हासिल करने से वंचित होने लगे। इससे समाज में आर्थिक असमानता बढ़ी है। अब समय आ गया है जब स्कूली शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार कर इस मुद्दे पर एक टीम इंडिया का गठन किया जाना चाहिए, जिससे देश के हर नागरिक का बच्चा ऐसी शिक्षा ग्रहण कर सके, जो उसमें संस्कार भी विकसित करने में सक्षम हो साथ ही देश के हर नागरिक के समग्र विकास का सपना पूरा हो सकेगा।