विश्व शांति के लिए चुनौती बनता ईरान संकट
   Date07-Jun-2019
ब्रह्मदीप अलूने
अं तरराष्ट्रीय राजनीति में 'हिंसा की कूटनीतिÓ का उपयोग महाशक्तियां बदले की नीति के तौर पर करती रही हैं। इस आक्रामक नीति का एकमात्र लक्ष्य दुश्मन पर विजय पाना रहा है। इसलिए प्रतिद्वंद्वी राष्ट्र पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने के लिए युद्धोन्माद, आर्थिक प्रतिबंध, खतरनाक हथियारों की तैनाती जैसी कोशिशें की जाती हैं, ताकि वह राष्ट्र अस्थिरता की ओर बढ़ जाए और गहरे दबाव में महाशक्तियों के आगे झुक जाए। दरअसल, मध्य-पूर्व अंतरराष्ट्रीय राजनीति का ऐसा केंद्र है जहां महाशक्तियां अपने आर्थिक लाभ के लिए युद्धोन्माद की स्थितियां पैदा करती रही हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद मध्य-पूर्व की तेल कूटनीति ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति को काफी प्रभावित किया है। इसी तेल के चलते ईरान की खाई जैसी मरुभूमि भी आज वरदान बन गई है। लेकिन वहीं इस इलाके की यह विशेषता मध्य-पूर्व की अशांति का कारण भी बन गई है। हिंसा और अशांति से अभिशप्त मध्य-पूर्व को एक बार फिर युद्ध की ओर धकेला जा रहा है। इस बार अमेरिका का निशाना एक स्थापित राष्ट्र ईरान है जिसकी बर्बादी दुनिया में मानवीय त्रासदी का कारण बन कर आतंकवाद को मजबूत कर सकती है।
अमेरिका ने ईरान पर चोरी-छिपे परमाणु कार्यक्रम चलाने का आरोप लगा कर न केवल उससे अपनी संधि को खत्म कर दिया है, बल्कि हाल ही में भारत और चीन जैसे चुनिंदा देशों पर से भी ईरान से तेल खरीदने की छूट वापस लेकर ईरान की अर्थव्यवस्था की कमर तोडऩे की अपनी निर्णायक चाल चल दी है। अमेरिका के इस कदम से ईरान तेल का निर्यात नहीं कर पा रहा है और उसकी अर्थव्यवस्था पर असर पडऩे लगा है। आर्थिक के साथ सामरिक दबाव बढ़ाने के लिए ट्रंप ने ईरान के कड़े प्रतिद्वंद्वी सऊदी अरब के साथ ट्रंप ने आठ अरब डॉलर के हथियार सौदे को मंजूरी दे दी है। इन हथियारों में अत्याधुनिक युद्ध सामग्री और आधुनिक बम शामिल हैं। इसके साथ ही अमेरिका ने अपने जंगी जहाज को समंदर में तैनात कर दिया है। मध्य-पूर्व के इराक जैसे देश से अमेरिका के नागरिकों को वापस लौटने को कह दिया गया है। अमेरिका के इस कदम से मध्य-पूर्व में पहले से ही जो अस्थिरता बनी हुई है, वह युद्ध की प्रबल आशंका में बदल गई है। ईरान को लेकर अमेरिकी नीति में आक्रामकता का एक प्रमुख कारण ट्रंप का कथित इजराइल प्रेम भी रहा है। इजराइल के अस्तित्व को पश्चिम एशिया में नकारने वाला पठारी, पहाड़ी और मरुस्थलीय ईरान मध्य-पूर्व का ऐसा आक्रामक खिलाड़ी है जिसका खौफ अरब के सुन्नी देशों, इजराइल और अमेरिका को भी परेशान करता रहा है। शिया बहुल ईरान धार्मिक कारणों से सऊदी अरब के निशाने पर है, सामरिक दृष्टि से वह इजराइल का सबसे बड़ा शत्रु माना जाता है, जबकि इजराइली प्रेम में डूबे अमेरिका के लिए ईरान शैतान की धुरी है।
ईरान को दबाने की कोशिशों में साल 2018 में इजराइल को तब सफलता मिली जब ईरान के गोपनीय परमाणु हथियार कार्यक्रम 'प्रोजेक्ट अमादÓ की हकीकत को बेहद सनसनीखेज तरीके से दुनिया के सामने लाकर इजराइल ने रणनीतिक दांव खेला। ईरान के मध्य एशिया में बढ़ते प्रभाव को नियंत्रित करने के लिए इजराइल ने अपनी खुफिया एजेंसी मोसाद के जरिए ईरान के परमाणु कार्यक्रम में सेंध लगा कर दुनिया को हैरान कर दिया था।
इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने पिछले साल दावा किया कि उनके पास तेहरान के एक गुप्त ठिकाने से इजराइली खुफिया विभाग को मिली डेटा की 'कॉपियांÓ हैं। इनमें पचपन हजार पन्नों के सबूत के साथ 183 सीडी और फाइलें हैं। नेतन्याहू ने यह दावा किया था कि ईरान परमाणु समझौते को ठेंगा दिखा कर गुपचुप तरीके से परमाणु हथियारों का जखीरा बनाने की ओर अग्रसर है। इजराइल के इस खुलासे के बाद ट्रंप ने बेहद आक्रामक कदम उठाने के संकेत दे डाले। अमेरिकी राष्ट्रपति ने ईरान के साथ साल 2015 में हुए परमाणु समझौते से अमेरिका को अलग करने की घोषणा कर इसे अप्रासंगिक और बेकार बता कर दुनिया के सामने एक नया कूटनीतिक संकट खड़ा कर दिया। ट्रंप यहीं नहीं रुके। उन्होंने ईरान के साथ हुए समझौते के बाद आर्थिक प्रतिबंधों में जो रियायतें दी गई थीं, उसे पुन: लागू कर दिया।
इसके पहले साल 2015 में ओबामा प्रशासन में हुए एक समझौते के तहत ईरान पर हथियार खरीदने पर पांच साल तक प्रतिबंध लगाया गया था। इसके साथ ही मिसाइल प्रतिबंधों की समय सीमा आठ साल तय की गई थी। इसके बदले में ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम का बड़ा हिस्सा बंद कर दिया था और बचे हुए हिस्से की निगरानी अंतरराष्ट्रीय निरीक्षकों से कराने पर राजी हो गया था। जनवरी 2016 में शुरू हुए इस समझौते को 'ज्वाइंट एंड कंप्लीट एक्शन प्लानÓ का नाम दिया गया था। इस समझौते पर जर्मनी, चीन, अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन और रूस के साथ तेहरान ने हस्ताक्षर किए थे, जिसके तहत ईरान पर लगे प्रतिबंधों को हटाने के बदले उसे परमाणु कार्यक्रमों पर नियंत्रण लगाना है। इस प्रकार ईरान के साथ इस समझौते में अन्य वैश्विक शक्तियां भी शामिल हुई थीं और इस परमाणु समझौते को मध्य-पूर्व में शांति स्थापना की दिशा में उठाया गया एक महत्वपूर्ण कदम माना गया था। दूसरी ओर सऊदी अरब की इस्लामिक देशों का सर्वमान्य नेतृत्व कहलाने की आकांक्षा ने भी मध्य-पूर्व की शांति को संकट में डाला है।
अमेरिका और ईरान के बीच ताजा तनाव को लेकर सऊदी अरब के विदेश मंत्री अदेल अल-जुबैर ने कहा है कि सऊदी अरब इस इलाके में किसी भी तरह का संघर्ष नहीं चाहता। जबकि वास्तव में ईरान को अस्थिर करने में सऊदी अरब अग्रणी है। सऊदी अरब और ईरान का धार्मिक-वैचारिक टकराव मध्य-पूर्व के कई देशों को प्रभावित करता रहा है। अरब का एक देश यमन गृहयुद्ध से जूझ रहा है। वहां पर सऊदी अरब के नेतृत्व में एक अंतरराष्ट्रीय गठबंधन की सेना है जो हूथी विद्रोहियों से मुकाबला कर रही है। सऊदी नेतृत्व को यह लगता है कि हूथी विद्रोहियों को ईरान से हथियारों की मदद मिल रही है। सीरिया में जारी गृहयुद्ध में ईरान राष्ट्रपति बशर अल-असद का समर्थन कर रहा है। बशर को रूस का समर्थन हासिल है। पश्चिम एशिया के एक और देश लेबनान में अस्थिरता है और यहां पर ईरान समर्थित शिया मिलिशिया समूह हिजबुल्ला का प्रभाव सऊदी अरब के लिए जानलेवा है। यमन, सीरिया और लेबनान में ईरान का सामरिक मित्र रूस है और इसीलिए मध्य-पूर्व में नियंत्रण स्थपित रखने के लिए महाशक्तियां आमने-सामने हैं।
इस घटनाक्रम के साथ यह बेहद दिलचस्प है कि मुसलिम दुनिया के सबसे बड़े दुश्मन इजराइल को लेकर सऊदी अरब के रुख में आश्चर्यजनक परिवर्तन आया है और उसके नेता कई मंचों पर एक दूसरे से रू-ब-रू भी हुए हैं। इसका प्रमुख कारण इजराइल और ईरान के बीच कड़ी दुश्मनी ही है। इजराइली सेना प्रमुख तो यह भी कह चुके हैं कि मध्य-पूर्व में सऊदी अरब और उनके देश के साझा हित हैं और वे साथ मिल कर लडऩे को तैयार हैं। इस समूचे घटनाक्रम में मध्य-पूर्व में ईरान को अमेरिका, सऊदी अरब और इजराइल द्वारा परमाणु कार्यक्रम को आधार बना कर घेरने की रणनीति अंतरराष्ट्रीय साजिश का हिस्सा नजर आती है। ईरान की परमाणु योजना आक्रामक नहीं है। इसे लेकर 2014 में पेंटागन की एक रिपोर्ट से स्पष्ट हो चुका है। बहरहाल, मध्य-पूर्व में ईरान को लेकर बढ़ता संकट विश्व शांति के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है। अमेरिकी हठधर्मिता से इराक और सीरिया गृहयुद्ध और मानवीय त्रासदी से पहले ही जूझ रहे हैं, ऐसे में ईरान जैसे स्थापित देश को युद्ध से तबाह होने से बचाने के लिए विश्व समुदाय को आगे आना चाहिए।