निरर्थक कल्पनाएं
   Date07-Jun-2019
प्रेरणादीप
ए क युवक ने स्वप्न में देखा कि वह किसी बड़े राज्य का राजा हो गया है। स्वप्न में मिली इस आकस्मिक विभूति के कारण उसकी प्रसन्नता का ठिकाना न रहा। प्रात:काल पिता ने काम पर चलने को कहा, माँ ने लकडिय़ाँ काट लाने की आज्ञा दी, धर्मपत्नी ने बाजार से सौदा लाने का आग्रह किया, पर युवक ने कोई भी काम न कर एक ही उत्तर दिया-'मैं राजा हूँ, मैं कोई काम कैसे कर सकता हूँ।Ó घरवाले बड़े हैरान थे, आखिर किया क्या जाए? तब कमान सँभाली उसकी छोटी बहन ने। एक-एक करके उसने सबको बुलाकर भोजन करा दिया। अकेले ख्याली महाराज बैठे-के-बैठे रह गए। शाम हो गई। भूख से आँतें कुलबुलाने लगीं। आखिर जब रहा न गया तो उसने बहन से कहा-'क्यों मुझे खाना नहीं मिलेगा क्या?Ó
बहन मुँह बनाते हुए बोली-'राजाधिराज! रात आने दीजिए, परियाँ आकाश से उतरेंगी तो वही आपके लिए उपयुक्त भोजन प्रस्तुत करेंगी। हमारा रूखा-सूखा भोजन आपके राजपद के उपयुक्त नहीं है।Ó युवक फिर बोला- 'नहीं, मैं यही भोजन कर लूंगा। तुम यही भोजन मेरे लिए ले आओ।Ó बहन बोली- 'महाराज! कहीं यह भोजन करके आप क्रोधित न हो उठे और यदि आप क्रोधित हो उठें तो खाना बनाने वालों पर व्यर्थ नाराज होंगे। आप स्वप्न में ही भोजन कीजिएगा।Ó अब व्यर्थ की कल्पनाओं में विचरण करने वाले युवक ने हार मानी और महसूस किया कि धरती पर रहने वाले मनुष्य को निरर्थक लौकिक एवं भौतिक कल्पनाओं में ही डूबे नहीं रहना चाहिए, वरन जीवन का जो शाश्वत और सनातन सत्य है, उसे प्राप्त और धारण करने का प्रयत्न भी करना चाहिए।