ईद की राजनीति
   Date07-Jun-2019
ईद का त्योहार शांति और सद्भाव का त्योहार है, लेकिन राजनेताओं ने इसका राजनीतिकरण कर दिया है। कई इफ्तार पार्टियों में ऐसे नेता शामिल होते हैं, जिनका न इस्लाम से सरोकार है और न ईद के रिवाज से वे केवल अपनी राजनीति को चमकाने के लिए टोपी पहनकर नमाज भी पढ़ लेते हैं। इस्लामी मजहबी नेतृत्व को यह समझना होगा कि इफ्तार पार्टियों के राजनीतिकरण को कैसे रोका जाए? नेताओं की उपस्थिति में इफ्तार पार्र्टी केवल नेताओं की हो जाती है। ईद के अवसर पर प. बंगाल की मुख्यमंत्री ममती बनर्जी मुस्लिमों के बीच पहुंची। उन्होंने कहा कि प. बंगाल में किसी को डरने की जरूरत नहीं है। हम सभी धर्मों की रक्षा करेंगे। हम से जो टकराएगा, वह चूर-चूर हो जाएगा। ये हमारा नारा है। मुद्दई लाख बुरा चाहे तो क्या होता है, वही होता है जो मंजूरे खुदा होता है। डरो मत जितनी तेजी से उन्होंने ईवीएम पर कब्जा किया, उतनी ही तेजी से वे भाग भी जाएंगे। उनके भतीजे अभिषेक ने इस अवसर पर कहा कि अब भाजपा ने जय श्रीराम के स्थान पर जय महाकाल बोलना प्रारंभ कर दिया है। उन्होंने कहा कि लगता है कि श्रीराम की टीआरपी कम हो गई है। भाजपा के लोग राजनीति में धर्म मिला रहे हैं। इस पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए भाजपा के महासचिव और प. बंगाल भाजपा के प्रभारी कैलाश विजयवर्गीय ने कहा कि मैं नहीं समझता कि ममता 2021 तक सरकार चला पाएगी, क्योंकि वे अपरिपक्व की तरह बोलती है। हम तो 2021 की तैयारी कर रहे हैं, पर उससे पहले ही ममता सरकार खुद गिर जाएगी। पद्मश्री सम्मानित फिल्म निर्माता अपर्णा सेन ने कहा है कि भाजपा के जय श्रीराम के नारे का जवाब देकर ममता खुद अपनी कब्र खोद रही है। उन्होंने कहा कि यह मुझे बिल्कुल पसंद नहीं है। धर्म और राजनीति अलग-अलग होना चाहिए। राजनीति में धार्मिक नारों पर रोक लगना चाहिए। जो राजनीति को धर्म से अलग करने की बात करते हैं, उन्हें शायद भारत की जनता की नब्ज पर हाथ नहीं है। श्रीराम भारत की सांस्कृतिक चेतना के प्रतीक हैं। श्रीराम के प्रति हर हिन्दू के मन में अटूट श्रद्धा भाव है, जो श्रीराम विरोधी है, उसके समर्थन में हिन्दू खड़ा नहीं हो सकता। प. बंगाल में श्रीराम विरोधी ममता बनर्जी को हिन्दुओं ने नकार दिया है। यही कारण है कि 2019 के लोकसभा चुनाव में 40 में से 18 सीटों पर भाजपा ने जीत दर्ज की है। भाजपा की चुनौती से घबराई ममता अब हिंसा पर उतर आई है, सौ से अधिक भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्या हो चुकी है। जो हमसे टकराएगा, मिट्टी में मिल जाएगा। ममता के पास पुलिस प्रशासन है, उनसे कौन टकरा सकता है, उनको भाजपा का फोबियो हो गया है। श्रीराम जय महाकाली के जयकारे उन्हें डरावने लगते हैं। कई टीएमसी के कार्यकर्ता नेता भाजपा में शामिल हो गए हैं। ममता के लिए शुभ यही हो सकता है कि पहले वे अपनी पार्टी को संभाले।
दृष्टिकोण
कौन मनाता है खूनी ईद ?
ड्डमाना कि हर धार्मिक त्योहार शांति सद्भाव का संदेश देते हैं, ईद भी ऐसे त्योहारों में से एक त्योहार है। भारत में सभी धर्मों को फलने-फूलने का अवसर दिया है। ईद के दिन जो आतंकी इस्लाम के नाम पर हिंसा करते हैं, वे इस पवित्र दिन भी अपने हाथों की बंदूके और पत्थरों से लोगों का सिर फोडऩे से बाज नहीं आएंगे। ईद के दिन ही कश्मीर घाटी के एक घर में घुस गए और उन्होंने ईद की नमाज पढ़ रही। एक मुस्लिम महिला को गोलियों से भून दिया। अन्य परिवारजनों को घायल कर दिया। ईद के ही दिन मस्जिद में नमाज पढ़कर निकले कश्मीर के सैकड़ों युवकों ने सुरक्षा बलों पर पथराव शुरू कर दिया। अश्रु गैस गोले भी छोडऩा पड़े। घर में घुसकर मुस्लिम महिलाओं की नमाज अता करते समय गोलियों से भूनकर उनकी हत्या कर दी, वे आतंकवादी भी इस्लाम के नाम पर ईद के पवित्र त्योहार की पवित्रता को नष्ट करते हुए हिंसा करते हैं। इसी तरह पत्थरबाजों के पत्थर भी इस्लाम के नाम पर चलते है, जो ईद को खून से रंगते है, उनका इस्लाम सच्चा है या जो ईद के दिन शांति, सद्भाव भाईचारे की बात करते है, वह इस्लाम सच्चा है। इस्लाम के जानकार ही इस सवाल का उत्तर दे सकते है। बातें शांति सद्भाव की हो और व्यवहार खून-खराबे का हो, ऐसे इस्लाम की सच्चाई को समझना होगा। अब समय भारत के मुस्लिमों के लिए भी चिंतन का है कि एक ओर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सबका साथ-सबका विकास और सबके विश्वास की बात करते है। उनकी बातों का कई मुस्लिम विद्वानों ने समर्थन भी किया है, फिर क्या कारण है कि मुस्लिम नेतृत्व ईद को मानव खून से लथपथ करने वालों के खिलाफ तीखी प्रतिक्रिया क्यों नहीं व्यक्त करते। क्यों नहीं आतंकवादियों के खिलाफ मुस्लिम नेतृत्व अभियान चलाता। आतंकवाद के खिलाफ मौन रहने से कई सवाल पैदा होते हैं।