सपा-बसपा दोस्ती टूटी, कांग्रेस भी बिखरी
   Date06-Jun-2019
उत्तर प्रदेश में चुनाव के पहले सपा-बसपा-रालोद के गठबंधन को
महागठबंधन का नाम दिया गया। भाजपा को हराने के लिए इस गठबंधन का जातिवादी फार्मूला था। अखिलेश यादव के यादव वोट और दलित वोट मिलकर भाजपा को पटकनी दे सकते हैं। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भी कहा था कि 23 जून को चुनाव परिणाम आने के बाद यह मिलावटी गठबंधन बिखर जाएगा। चुनाव परिणाम से इस महागठबंधन की हवा निकल गई। बसपा ने लोकसभा चुनाव में तीन सौ प्रत्याशी खड़े किए थे। उत्तर प्रदेश में बसपा ने 37 सीटों पर चुनाव लड़ा, जिसमें से दस सीटों पर जीत दर्ज कर सकी। सपा ने 35 सीटों पर चुनाव लड़ा, जिसमें से पांच सीटों पर जीत मिली। उत्तर प्रदेश में कुल लोकसभा की अस्सी सीटें है, भाजपा की मोदी लहर में इस महागठबंधन को ध्वस्त करते हुए 65 सीटों पर विजयी परचम फहरा दिया। अब मायावती इस बात पर माथापच्ची कर रही है कि यादवों के वोट बसपा को क्यों नहीं मिले? मायावती को भरोसा था कि सपा के साथ गठबंधन होने से यादव वोट उनकी पार्टी को ट्रांसफर हो जाएंगे। दिल्ली की समीक्षा बैठक में उन्होंने कहा कि सपा के साथ गठबंधन से उन्हें कोई फायदा नहीं हुआ। यादव वोट उन्हें मिलने की बजाय भाजपा को मिले है। बसपा को केवल मुस्लिम वोट मिले हैं। उन्होंने कहा कि अखिलेश यादव अपनी पत्नी डिम्पल और भाई को भी जितवा नहीं सके। सपा को केवल पांच सीटें मिल सकी है। इस महागठबंधन ने भाजपा को हराने का सपना इस आधार पर देखा था कि अखिलेश के कहने पर यादव वोट बसपा को मिलेंगे। दलित वोटों पर मायावती का एकाधिकार है। राष्ट्रवाद की लहर में जातिवादी किले ध्वस्त हो गए। मायावती ने अपनी पराजय का ठीकरा सपा के साथ ईवीएम पर भी फोड़ा है। इसी तरह अखिलेश यादव भी कह सकते हैं कि दलित वोट सपा को ट्रांसफर नहीं हुए। सवाल यह है कि क्या मायावती-अखिलेश यह समझते हैं कि यादव-दलित वोट भेड़-बकरी है जो उनके डंडे से हांके जाते हैं। अब हर मतदाता समझदार है, वह अपने विवेक से वोट देते हैं। उत्तर प्रदेश के मतदाताओं ने जातिवादी बंधन से मुक्त होकर स्वविवेक से मतदान किया है। उन्होंने मायावती के मजबूर सरकार की बजाय मजबूत सरकार के लिए मतदान किया। मोदी लहर ने जातीय समीकरण बिगाड़ दिए है। कांग्रेस में भगदड़ की स्थिति बनी है, एक समय महाराष्ट्र विधानसभा में विपक्ष के नेता रहे राधाकृष्ण वी.के. पाटिल ने कांग्रेस से त्याग पत्र दे दिया। उनका बेटा पहले ही कांग्रेस से रिश्ता तोड़ भाजपा में शामिल हो गया और अब वह भाजपा का विधायक है, कहा जाता है कि महाराष्ट्र के करीब एक दर्जन विधायक कांग्रेस छोड़ भाजपा में शामिल हो सकते हैं। इसी प्रकार कर्नाटक में जद(एस) के अध्यक्ष ने इस आरोप के साथ त्याग पत्र दे दिया कि कांग्रेस और जद(एस) के बीच तालमेल नहीं होने से वे अपना पद त्याग रहे है।
दृष्टिकोण
राष्ट्रवाद से हारा जातिवाद
2014 के पूर्व तक यह माना जाता था कि जातीय समीकरण के आधार पर ही चुनाव लड़े और जीते जाते हैं। जो दल जातीय राजनीति का विरोध करते थे, वे भी जाति के आधार पर चुनावी रणनीति बनाते और टिकिट भी इसी आधार पर दिए जाते थे। इस संदर्भ में मायावती बिना लाग लपेट के जाति आधारित अपने गणित को सार्वजनिक करती रही है। मायावती ने माना है कि उनका वोट बैंक दलित है और दलित + मुस्लिम से उन्हें सफलता मिलती है, उन्होंने उत्तर प्रदेश में अखिलेश यादव की सपा से गठबंधन इसलिए किया था कि उन्हें यादव और पिछड़ी जाति के वोट मिलेंगे। इस महागठबंधन में अजित सिंह के रालोद को इसलिए शामिल किया गया था कि उनको जाटों का समर्थन प्राप्त है। दलित + यादव + मुस्लिम + जाट और पिछड़े वर्ग को वोट इस महागठबंधन को मिले तो वे नरेन्द्र मोदी के विजयी रथ को उत्तर प्रदेश में रोकने में सफल होंगे। जाति आधारित गठबंधन से पहले भी जीत दर्ज होती रही है। परिवार या वंशवादी राजनीति भी भारतीय राजनीति का स्वाभाविक चरित्र बन गया। कांग्रेस, सपा आदि ऐसे दल है, वे अपने परिवार को राजनीति में स्थापित करने में लगे हैं। कांग्रेस ने अपनी पराजय की जो समीक्षा की, उसमें राजस्थान के मुख्यमंत्री गेहलोत और म.प्र. के मुख्यमंत्री कमलनाथ की इसलिए आलोचना हुई कि इन्होंने अपने बेटों को जितवाने पर ध्यान केन्द्रित किया, इसलिए कांग्रेस को इन प्रदेशों में करारी पराजय मिली।
राजस्थान की सभी लोकसभा सीटों पर भाजपा ने प्रभावी जीत दर्ज की। म.प्र. ने 29 लोकसभा सीटों से 28 पर भाजपा ने लाखों वोटों के अंतर से कांग्रेस के प्रत्याशियों को पराजित किया। यहां केवल कमलनाथ का बेटा जीत सका। कांग्रेसी अपनी पराजय का ठीकरा एक दूसरे पर फोड़ रहे हैं।