राष्ट्रोत्थान का सूत्र अपनी संस्कृति से अनुराग
   Date06-Jun-2019
धर्मधारा
क विवर रवींद्र के शब्दों में - यह भारत देश महानता का केन्द्र है और मेेरे हृदय, इस पवित्र तीर्थ में अपनी आँखों को खोलो किसी को ज्ञात नहीं है कि किसके आमंत्रण पर मनुष्यता की कितनी ही धाराएं तीव्र वेग से प्रवाहित होती हुई कहां-कहां से आईं और इस महासमुद्र में समा गई। आर्य, अनार्य, द्रविड़ और चीनी वंश के लोग यहां हैं। शक, हूण, पठान और मंगोल जैसी जातियां आईं और एक शरीर में समाकर एक हो गईं। इस देश के हृदय में प्रवाहित रक्त में सबका स्वर ध्वनित हो रहा है।
इसके सार्वभौम दर्शन एवं उदार दृष्टिकोण के कारण इसे विश्व संस्कृति का पर्याय माना जाता रहा है। ज्ञान विज्ञान की विविध धाराएं इसके गर्भ से बहीं व इसने पूरे विश्व को अपने नानाविध अनुदानों से उपकृत किया। बीच में कालक्रम में इसका प्रवाह कुछ मंद अवश्य हुआ, लेकिन यह मिटा नहीं। हर युग में ऋषि-मनीषी एवं आध्यात्मिक महापुरुषों का प्रादुर्भाव होता रहा है और वे इसके भाव-प्रवाह को युगानुकूल दिशा देते हुए इसमें नया आयाम जोड़ते जाते हैं। उनके बताए मार्ग पर चलने और दैनिक जीवन में उन्हें मूर्तरूप देने की त्वरा इसके हर नागरिक को आदर्शवाद के मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित करती रही है। हर युग में ऐसे अनगिनत उदाहरण भरे पड़े हैं। अतीत के इतिहास का पन्ना-पन्ना इसकी गवाही देता है। पारिवारिक, सामाजिक एवं राष्ट्रीय आदर्शों के लिए देश, धर्म, संस्कृति, जाति एवं मानवीय मूल्यों के लिए जीने एवं मर-मिटने वालों की ऐसी परम्परा यहां रही है कि सिर श्रद्धा से नतमस्तक हो जाता है। महर्षि अरविंद के शब्दों में कौन से क्षेत्र में भारत ने प्रयास नहीं किया, उपलब्धि नहीं हासिल की और सृजन नहीं किया और वह भी बड़े पैमाने पर, बड़े विस्तार और सावधानीपूर्वक पूर्णता के साथ। वस्तुत: आध्यात्मिकता भारतीय मन की सर्वकुंजी है और अनंत का भाव उसमें जन्मजात है। आज देश, समाज एवं मानव जाति के संक्रमण के ऐतिहासिक मोड़ पर जरूरत ऐसे राष्ट्र के सपूतों की, संस्कृति दूतों की है, जो अपने संस्कृति के आदर्शों, मूलेयं एवं उच्चतम मानदंडों को जीवन में धारण कर इनकी समयानुकूल उपयोगिता-प्रासंगिकता को सिद्ध कर सके।