मानवीय आदर्श
   Date06-Jun-2019
प्रेरणादीप
ब ड़े लाड़ के साथ माँ ने अपने पुत्र से कहा- 'बेटा, ले ये दो टुकड़े मिठाई के हैं। इनमें से यह बड़ा टुकड़ा तू स्वयं खा लेना और छोटा टुकड़ा अपने साथी को दे देना।Ó
अच्छा माँ '-कहकर वह बालक दोनों टुकड़े लेकर घर से बाहर आ गया। वह साथी को मिठाई का बड़ा टुकड़ा देकर स्वयं छोटा खाने लगा। माँ यह सब खिड़की में से देख रही थी। उसने आवाज देकर बालक को बुलाया व बोली- 'अरे क्यों रे! मैंने तुझसे बड़ा टुकड़ा खुद खाने और छोटा उस बच्चे को देने के लिए कहा था, किंतु तूने छोटा स्वयं खाकर बड़ा उसे क्यों दिया?Ó
बालक सहज बोली में बोला- 'माँ! दूसरों को अधिक देने और अपने लिए कम-से-कम लेने में मुझे मालूम नहीं क्यों अधिक आनंद आता है।Ó
वह बालक था-बाल गंगाधर तिलक। माँ गंभीर हो गईं व वे बहुत देर विचार करती रहीं-बालक की इन उदार भावनाओं के संबंध में। सचमुच यही मानवीय आदर्श है और इसी में विश्व शांति की, एकता की सारी संभावनाएँ निर्भर हैं। मनुष्य अपने लिए कम चाहे और दूसरों को अधिक देने का प्रयत्न करे तो समस्त संघर्षों की समाप्ति और स्नेह, सौजन्य की स्वर्गीय परिस्थितियाँ सहज ही उत्पन्न हो सकती हैं।