पराक्रम व कर्तव्य के अद्भुत साम्य शिवाजी
   Date06-Jun-2019
श्रीनिवास कुटुम्बले
प्रा चीन भारत के इतिहास में जितने भी हिन्दू राजा हुए उन शासकों में जो महान व्यक्तित्व प्रभु रामचन्द्र के, भगवान श्रीकृष्ण के चरित्र से प्रेरित रहा है तथा जिनके पराक्रम के कारण हिन्दू राष्ट्र, हिन्दू धर्म तथा हिन्दू संस्कृति जीवित और अविनाशी रही, ऐसे छत्रपति शिवाजी का जीवन चरित्र अद्भुत व अलौकिक है, जिस कालखंड में स्वराज्य, स्वधर्म तथा स्वतंत्रता जैसे शब्दों का उच्चारण करना भी असंभव था, उस कालखंड में शिवाजी ने अपने पराक्रम और कर्तव्यनिष्ठा से जो राज्य स्थापित किया उसके परिणामस्वरूप इतिहास में शिवाजी राजा एक महान शासक के रूप में यशस्वी एवं आदरणीय कहलाए।
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥
भगवान श्रीकृष्ण द्वारा कहे गए वचनों के अनुसार संभवत: कलियुग में यह ईश्वर का अवतार ही था। शिवाजी के जीवन के प्रत्येक प्रसंग मे प्रगट हुई दूरदर्शिता एवं प्रत्येक प्रसंग मे दर्शाई हुई सावधानियाँ और उनमें दिखने वाला उनका रूप देखकर मन अभिभूत हो जाता है, इतना चरित्र सम्पन्न दूरदृष्टा और विविधतापूर्ण व्यक्तित्व का धनी, ऐसा व्यक्ति इतिहास में निश्चित ही बिरला है। राज्य स्थापना करते समय प्रजा के समस्त कल्याण की जवाबदारी सिर्फ राजा की होती है, यह वें भली भांति जानते थे इसीलिए अनेकों युद्ध लडऩे के बाद भी उन्होंने प्रजा पर नए कर कभी भी नहीं थोपें। प्रजा का सभी प्रकार सें कल्याण करने के लिए सदैव तत्पर शिवाजी महाराज का रूप उनके जीवन इतिहास के अनेक प्रसंगों में दिखता हैं। उनकी इसी भूमिका के कारण प्रजा उन्हे देवतुल्य मानती थी।
धर्म एवं भगवान में आस्था रखने वाले शिवाजी महाराज मानते थे कि 'स्वराज्यÓ की स्थापना हो यह तो श्री की इच्छा से ही संभव है।
उनकी महानता को देखते हुए आज के मैनेजमेंट के विद्यार्थीयों के लिए शिवाजी महाराज यह अभ्यास का एक अनूठा एवं सर्वोत्तम विषय है।
जरा देखें
Perfection of planning,
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किन-किन विधायों की सूची बताएं, आप खुद ही जांच कर देख लें।
वैसे देखा जाएं तो उस काल में शिवाजी महाराज का तत्कालीन राज्य महाराष्ट्र के आज के छह जिलों के बराबर ही था। अखंडित हिंदुस्तान का आकार देखें तो ये लगभग नगण्य सा ही है, फिर इसका इतना महत्व क्यों है? पर जब ध्यान में आता है कि मुस्लिम आक्रमण के पाँच सौ वर्षो के कालखंड में सिर्फ शिवाजी नामक राजा ने अपने साथियों को एकत्रित कर मुस्लिम आक्रांताओं का सामना किया तथा अपने प्रजाजनों में एक अपूर्व विश्वास और स्वाभिमान जाग्रत किया।
जब मुगल सम्राट औरंगजेब के ध्यान मे ये बात आई की अगर यह भावना हिंदुस्तान के अन्य भागों मे फैली और हिन्दू प्रजा एकत्रित होने लगी तो मुस्लिम राज्य समाप्त होने में देर नहीं लगेगी और इसी कारण औरंगजेब ने अपनी सारी शक्ति शिवाजी को खत्म करने में लगा दी। अपनी जिंदगी के आखरी छब्बीस साल औरंगजेब महाराष्ट्र में ही डटा रहा और अंत मे यहीं उसकी मौत भी हुई। यहीं से शिवाजी ने प्रजा में जागृत स्वाभिमान की भावना का महत्व ध्यान में आया।
युग प्रवर्तक छत्रपति शिवाजी महाराज का जीवन चरित्र, कार्य, कर्तव्य, राज्य व न्याय व्यवस्था अतुलनीय थी। उनमें अदम्य साहस और नेतृत्व के बिरले गुण अभिव्यक्त होते रहे तथा अपने सहयोगियों को प्रेरित करने की अद्भुत कला थी, उसी कारण बाजी प्रभु देशपांडे, तानाजी मालुसरे, शिवा काशिद, मुरारबाजी, कोंडाजी, फर्जद जैसै अनेक वीर तैयार हुए, जिन्होंने हिंदवी स्वराज हेतु अपने जान की बाजी लगा दी।
उनकी युद्ध नीति बिरली थी जो अफजल खान का युद्ध तथा सिद्धी जौहर के घेरे में से बच के निकालने में परिलक्षित होती है। एक लाख सैनिकों की छावनी के अंदर जाकर उसके मुखिया औरंगजेब के मामा शाहिस्तेखान पर हमला करना तथा सुरक्षित रूप में घेरे से बाहर निकलना, आज जिसे हम सर्जिकल स्ट्राइक के रूप में जानते है। उसका ज्वलंत उदाहरण है!
औरंगजेब की राजधानी आगरा से बादशाह की कैद से फरार होना और मात्र पच्चीस दिनों में 2200 किमी की दूरी लांघकर राजगढ़ पहुंचना एक अद्भुत कार्य था। वर्तमान में यह महान व्यक्तित्व और भी सामायिक हो चला है।
लगभग 350 वर्षो का कालखंड बीत जाने के उपरांत भी इतिहास के इस महापुरुष के जीवन का अध्ययन आज के समाज को, युवाओं को नई चेतना, उत्साह, और सहस की प्रेरणा दे सकता है, राष्ट्र निर्माण में दिशा दे सकता है। वर्तमान में सामजिक, राष्ट्रीय एवं राजनैतिक विचारधाराए प्रदूषित हो रही है, नीव की कीमत पर कलश टकरा रहे है। इन परिस्थितिओं में इतिहास और ऐतिहासिक व्यक्तित्व ही हमें दिशा दे सकते है। हमें आज के युवाओं को इतिहास के नजदीक ले जाना होगा, उससे परिचय कराना होगा।