एकेश्वरवाद ही वेद की अभिव्यक्ति
   Date04-Jun-2019
धर्मधारा
इ स समूची कायनात का मालिक कौन है? क्या सचमुच कोई भगवान है? क्या सचमुच इस संसार में ईश्वर की सत्ता है अथवा यह कोरी कल्पना मात्र है? यदि ईश्वर है तो वह कौन है, कहां है, कैसा है? और यदि नहीं है तो इस जगत का नियंता कौन है? कौन है इस सृष्टि का सृजनकर्ता, पालक व संचालक? ऐसे ही अनेक प्रश्न युगों-युगों से अध्यात्म पिपासुओं, साधकों से लेकर सामान्य मनुष्यों के मन में सदा जन्म लेते रहे हैं एवं आस्तिक व नास्तिक, दोनों को ही अपने-अपने तरीकों से इन प्रश्नों के उत्तर देते रहे हैं।
विश्व के विविध धर्मों में ईश्वर की परिकल्पना विविध प्रकारों से की गई है। अस्तु विविध धर्मों व धर्मग्रंथों में ईश्वर संबंधी विविध विचार, व्याख्याएं व मान्यताएं हैं। विविध धर्मों ने ईश्वर के अलग-अलग नाम दिए हैं, पर वस्तुत: ईश्वर है तो एक ही। उसी एक ईश्वर को विविध धर्मों ने अल्लाह, गॉड, भगवान, सत्श्रीअकाल, ओंकार, अहुरमज्द, ताओ आदि विविध नामों से पुकारा है। जैसे सरिताएं अलग-अलग मार्ग से प्रवाहित होने पर भी अंत में एक ही सिंधु में विलीन होती हैं, वैसे ही विभिन्न धर्म उसी एक ईश्वर को प्राप्त करने के विभिन्न मार्ग कहे जा सकते हैं। मार्ग अलग-अलग हैं, पर मंजिल तो एक ही है। वह ईश्वर है, परमेश्वर है। ईश्वर एक ही है, पर विद्वानों ने उसे विभिन्न रूपों में प्रकाशित किया है। ऋग्वेद (1-164-46) के प्रस्तुत मंत्र में यही भाव मुखरित हुआ है
एकं सद्विप्रा बहुधा वदन्ति।
अर्थात् -सत्य एक ही है और उसी सत्य को विद्वज्जन विविध नामों से पुकारते हैं। वेदों में ऐसा एक भी मंत्र नहीं है, जो ईश्वर के अनेक होने की घोषणा करता हो। एकेश्वरवाद ही वेद की अभिव्यक्ति है। वेद में ईश्वर को 'ब्रह्मÓ कहा गया है। अथर्ववेद (10-8-1) में कहा गया है
यो भूतं च भव्यं च सर्वं यश्चाधितिष्ठति।।
स्वर्यस्य च केवलं तस्मै ज्येष्ठाय ब्रह्मणे नम:॥
अर्थात्-जो भूत, भविष्य और सब में व्यापक है, जो दिव्यलोक का भी अधिष्ठाता है, उस ब्रह्म (परमेश्वर) को प्रणाम है। ऋग्वेद (3-62-10) में भी आए गायत्री मंत्र में ईश्वर का स्वरूप कुछ इस प्रकार अभिव्यक्त हुआ है-
ओम भूर्भुव: स्व: तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य।
धीमहि धियो यो न: प्रचोदयात्।
अर्थात-उस प्राणस्वरूप, दु:खनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अपनी अंतरात्मा में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करे। वहीं ईशावास्योपनिषद् में ईश्वर की सर्वव्यापकता कुछ इस प्रकार मुखरित हुई है।