इस्तीफों में उलझा कांग्रेस का चिंतन...
   Date04-Jun-2019
लोकसभा चुनाव 2019 में करारी हार के बाद कांग्रेस पा

र् को राहुल-सोनिया के नेतृत्व में व्यापक समीक्षा, चिंतन एवं कारगर कार्रवाई का दौर चलाना चाहिए, लेकिन यह चिंतन, समीक्षा का खेल तो सिर्फ इस्तीफों में उलझकर रह गया है... इसमें कोई दो राय नहीं कि कांग्रेस पार्टी में इस्तीफे का सिलसिला न केवल स्वाभाविक, बल्कि आज के माहौल में अनिवार्य भी है... राष्ट्रीय अध्यक्ष के साथ ही करीब 6-7 प्रदेश अध्यक्षों के इस्तीफे स्वाभाविक इसलिए हैं, क्योंकि हार बहुत बड़ी है और उसकी जिम्मेदारी का एहसास होना ही चाहिए... ये इस्तीफे अनिवार्य इसलिए हैं कि पार्टी अपने पुनरोद्धार के लिए नई सोच के साथ, नए सिरे से, नए नेतृत्व में आगे बढ़ सकेगी... उत्तर प्रदेश, ओडिशा, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, पंजाब, झारखंड, असम वगैरह राज्यों के कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष हार की जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा सौंप चुके हैं... इसके अलावा कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में राहुल गांधी ने भी इस्तीफे की पेशकश कर रखी है, जिसे कांग्रेस के दिग्गज नेताओं ने पार्टी की परंपरा के अनुरूप ही नकार दिया है.., लेकिन क्या राहुल के इस्तीफा दे देने भर से या राज्यों में प्रदेश अध्यक्षों द्वारा इस्तीफा देने से संगठन मजबूत हो जाएगा..? क्योंकि इस्तीफा देकर तो हार को पूर्णत: एक रस्म के तहत बिसारने का ही खेल है, जिससे नतीजा निकलता नजर नहीं आता...
इस्तीफे की जिद, राहुल गांधी का यह विचार हार से उपजी निराशा का फल है, लेकिन देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस की यह मजबूरी सर्वविदित है कि उसे नेहरू-गांधी परिवार का नेतृत्व चाहिए... राजीव गांधी के बाद कुछ समय के लिए कांग्रेस पार्टी इस परिवार से दूर रहकर अपना हश्र देख चुकी है... वर्ष 2004 और फिर 2009 के आम चुनाव में कांग्रेस की दमदार वापसी में इसी परिवार के नेतृत्व की बड़ी भूमिका थी... कांग्रेस में उच्चतम नेतृत्व के मामले में समझौते की गुंजाइश नहीं के बराबर है...
हालांकि कांग्रेस को केंद्रीय कार्यसमिति और राज्य स्तर पर जरूरत के हिसाब से बदलाव करने पड़ेंगे... ऐसे दिग्गजों को पार्टी ज्यादा न ढोए, जिनका जमीनी आधार वर्षों पहले खत्म हो चुका है या कभी बना ही नहीं... कांग्रेस सबसे समृद्ध इतिहास वाली पार्टी है, लेकिन वह विरासत को बोझ नहीं बनने दे... कांग्रेस के बारे में अक्सर कहा जाता है कि कांग्रेस पार्टी नहीं, आंदोलन है, लेकिन आज आंदोलन छेडऩे वाले कम हो गए हैं...
भारतीय राजनीति और जनमानस को उसे नए सिरे से समझना होगा... कांग्रेस पहले यही करती थी और भाजपा अब यही करती दिख रही है... दो बार अपने दम पर बहुमत पाने में कामयाब हो गई है... भाजपा का मत प्रतिशत 37 के पार पहुंच गया, जबकि कांग्रेस का मत प्रतिशत 20 से नीचे ठिठक गया..? देश की सबसे पुरानी पार्टी केवल एक राज्य पुड्डुचेरी में 50 प्रतिशत से ज्यादा मत ले पाई है, जबकि भाजपा को 17 राज्यों में 50 प्रतिशत से ज्यादा मत मिल गए... सिर्फ केरल और पंजाब में कांग्रेस का प्रदर्शन सराहनीय रहा है...
पंजाब में अच्छे प्रदर्शन के बावजूद पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष सुनील जाखड़ ने इस्तीफा दे दिया है, क्योंकि वह स्वयं अपनी सीट बचाने में नाकाम रहे हैं... सुनील जाखड़ के इस्तीफे से भी पार्टी में अन्य जिम्मेदार नेताओं पर नैतिक दबाव बढ़ा है, तो इसे समझा जा सकता है... भारत ही नहीं, दुनियाभर में कांग्रेस के ऐसे हश्र पर खूब चिंतन जारी है, लेकिन सबसे जरूरी है कि भारत की प्रमुख विपक्षी पार्टी चिंतन करे... यह देश के लिए भी अच्छी बात नहीं होगी कि मुख्य सत्ताधारी दल लडऩा सीखता जाए और प्रमुख विपक्षी दल लडऩा भूलता जाए... पूरे देश में मौजूदगी रखने वाली एकमात्र पार्टी लगातार दो बार से लोकसभा में आधिकारिक विपक्ष का दर्जा भी नहीं हासिल कर पा रही है... बेशक, कांग्रेस मजबूत विपक्ष तभी बनेगी, जब वह रस्मी इस्तीफों से आगे जाकर ईमानदारी से हार की विवेचना करेगी... आज की हार के कारणों में ही भविष्य की जीत के सूत्र छिपे हैं...लेकिन क्या कांग्रेस के क्षेत्रीय क्षत्रप और राज्यों के पार्टी प्रमुख को मजबूत करने के पहले राहुल गांधी भी संगठन के साथ स्वयं को मजबूत करने का विचार रखते हैं... फिलहाल तो ऐसा लगता दिखता नहीं... क्योंकि हताश-निराश राहुल ने फिलहाल किसी वरिष्ठ नेता के पास जाकर चिंतन-मनन की भी पहल नहीं की है... यह उनके नीति कार्यों की विफलता भी है...