असंभव उम्मीद
   Date04-Jun-2019
प्रेरणादीप
स्वा मी विवेकानंद ने सन् 1893 में विश्व धर्म संसद में ऐतिहासिक व्याख्यान में यह कहा था कि मुझे अपने धर्म पर गर्व है, जिसने दुनिया को सहिष्णुता और सार्वभौमिक स्वीकार्यता की शिक्षा दी। हम न केवल सार्वभौतिक सहिष्णुता में विश्वास करते हैं, अपितु सभी धर्मों को मूल रूप से स्वीकार भी करते हैं। मुझे अपने देश पर भी गर्व है, जिसने सभी धर्मों और सभी देश के लोगों को शरण दी। इसके साथ उन्होंने यह भी कहा था कि यह खूबसूरत धरती लंबे समय से तमाम खांचों में बंटे समाज, धर्मांधता और उसके खतरनाक प्रभावों से बदसूरत होती जा रही है। इसकी वजह से हिंसा बढ़ी और कई बार खूनखराबे तक की नौबत आई, जिसने इंसानी सभ्यता को नष्ट किया और जिसकी चपेट में लगभग सभी देश आए। अगर यह धर्मांधता का दानव नहीं होता, तो आज मानव समाज कहीं अधिक विकसित होता। किसी एक धर्म द्वारा दूसरे धर्म पर जीत हासिल करने के बाद शांति और एकता की उम्मीद करना बेमानी है।