भारतीय जनता पार्टी की जीत के निहितार्थ
   Date03-Jun-2019
प्रो.चिंतामणि मालवीय
रा जनीति एक सतत प्रवाह है, जिसमें कभी विराम नहीं आता, लेकिन उठने वाली हर लहर पिछले लहर से अलग होती है, इसलिए इतिहास बनाती है। 2019 के आम चुनाव के बाद स्वतंत्र भारत का राजनीतिक इतिहास दो उपखंडों में लिखा जाएगा एक भारत,नरेंद्र मोदी के पहले और दूसरा भारत, नरेंद्र मोदी के बाद,वास्तव में नरेंद्र मोदी के बाद का भारत एक अलग ही भारत मालूम होता है। 2014 में 30 सालों बाद नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश ने पूर्ण बहुमत की सरकार देखी थी। 30 सालों में देश का जनमत विखंडित जनादेश का आदि हो गया था और किसी एक पार्टी को और खासकर भारतीय जनता पार्टी को पूर्ण बहुमत अपने आप में आश्चर्य था, क्योंकि विविधताओं से संपन्न देश जहां सांप्रदायिक, जातीय, क्षेत्रीय,आर्थिक, भाषाई आधारों पर अनेक हित समूह हो ऐसे विशाल देश में मुद्दे भी भौगोलिक विस्तार के साथ अपनी शक्ल बदलते रहते हैं और मतदान का ट्रेंड भी बदलता है। विभाजित राजनीतिक चेतना वाले देश में किसी एक पार्टी को स्पष्ट बहुमत प्राप्त होना निश्चित ही सुखद आश्चर्य था, लेकिन शुद्ध रूप से गैर कांग्रेसी पार्टी (भाजपा को) 2014 के मुकाबले 2019 में 5.74 करोड़ अधिक वोट मिले 2014 के मुकाबले 2019 में भाजपा 21 अधिक सीट जीतने में कामयाब हुई। 2014 में 282 लोकसभा सीटों पर जीती भाजपा 2019 में ऐतहासिक बढ़त के साथ 303 सीट जीतने में कामयाब रही केवल सीटों में बढ़ोतरी नही हुई बल्कि 2014 के मुकाबले 33 प्रतिशत अधिक वोट भी भाजपा को मिलें।
दूसरी बार पहले से ज्यादा वोट आना और 303 सीटें अकेले दम पर जीत जाना। निश्चित रूप से भारतीय लोकतंत्र में आ रहे बड़े बदलाव का संकेत है। इस चुनाव के बाद राजनीतिक समीक्षकों,पत्रकारों,राजनीतिक पंडितों और विद्वानों को अपनी अनेक धारणाएं बदलनी पड़ेगी। अपने मापदंड और पैमाने फेंक देने पड़ेंगे। 2019 के पहले तक हार जीत का समीकरण अल्पसंख्यक, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति, पिछड़े, अति पिछड़े या जाति का संतुलन के आसपास बनते और बिगड़ते थे। आज बिहार और उत्तर प्रदेश में एम-वाई समीकरण बालू की दीवार सिद्ध हुए। इस दरकती दीवार को बचाने में बसपा के दलित वोटों का सहारा भी काम न आ सका।
अब लगता है कि भारत में लोहिया और जयप्रकाश के समाजवादी सिद्धांत के नाम पर चल रही घोर परिवारवादी राजनीति के दिन भी लद गए हैं। शायद समाजवाद की टोपी जो अपना आकार समय के साथ बदलती रहती है। सच में यह टोपी अब आकार हीन हो गई है। बिहार में लालू यादव,कश्मीर में महबूबा मुफ्ती, उमर अब्दुल्ला, हरियाणा में बरसों से दबदबा रखने वाले हुड्डा और चौटाला परिवार,उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव और चौधरी चरण सिंह आदि के खानदान की वंशवादी राजनीतिक विरासत खत्म हो गई है। केवल उड़ीसा में नवीन पटनायक और महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे अपना वोट और आधार बचाने में कामयाब रहे हैं। लेकिन बचने का कारण परिवारवाद के प्रति श्रद्धा नहीं, बल्कि नीतियों और विचारधारा पर दृढ़ता से कायम रहना है। जनता अब वंशवाद पर नही जनसेवा पर विश्वास करती है। जनता ने इस बार वंशवाद राजनीति पर करारी चोट की है। शायद यह राजनीति दल 2024 में अपना अस्तित्व भी ना बचा सकें।
पिछले वर्षों में यह पहला चुनाव है जिसमें राम मंदिर कोई मुद्दा नहीं था। बल्कि चुनाव के कुछ दिनों पूर्व स्वयं प्रधानमंत्री ने सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के पूर्व अध्यादेश लाने से स्पष्ट रूप से इंकार कर दिया एवं राम मंदिर के चुनावी मुद्दा होने की सारी संभावनाओं को खत्म कर दिया। इस प्रकार कई वर्षों से चले आ रहे मंडल एवं कमंडल कि इस चुनाव में कहीं भूमिका नहीं रही। पिछले चुनाव में शॉर्ट टर्म या अल्पजीवी मुद्दे बड़े प्रभावी और उलटफेर के मुख्य कारक रहे हैं। 1986 में बोफोर्स घोटाला चुनावी मुद्दा बना और कांग्रेसी 404 सीट से 197 सीट पर आ गई 2004 में अटलजी का सरकार न बनने का बड़ा कारण प्याज का महंगा होना भी था।
2019 में तात्कालिक और कृत्रिम मुद्दों की राजनीति को पीछे छोड़ दिया। राहुल गांधी के बहुत प्रचार के बावजूद 'राफेलÓ चुनावी मुद्दा न बन सका और उल्टे कांग्रेस पर ही बूमरेंग होकर गिरा।
नेताओं की भाषा ने भी अपना पैरामीटर चेंज किया और बहुत नीचे तक पहुंची, इन परिणामों ने भाषाई गिरावट को थामने की कोशिश की है।
देश की जनता राष्ट्रीय विषयों पर अधिक गंभीर हुई है। शायद इसीलिए कांग्रेस के घोषणा पत्र से शामिल देशद्रोह की धारा 124 ए समाप्त करने और धारा 370 नहीं हटाने के उपबंद ने कांग्रेस को करारा नुकसान पहुंचाया है। शायद अब आगामी चुनाव में राजनीतिक पार्टियों को तुष्टिकरण से ऊपर उठकर राष्ट्रवाद पर निष्ठा और अधिक दृढ़ता दिखानी होगी। पुराने ढर्रे पर वह फिर से मात खा जाएंगे।
एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि कांग्रेस ने सत्ता में आने पर प्रत्येक गरीब परिवार को रहने के लिए जमीन और 72000 प्रतिवर्ष देने का वादा किया था। वास्तव में भारतीय राजनीति में किसी भी हितसमूह को दिया गया सबसे बड़ा लालच था, लेकिन देश का गरीब इस लालच में नहीं फंसा और कांग्रेसी 18 राज्यों में खाता भी नहीं खोल पाए। इतना बड़ा वादा यदि 15-20 साल पहले किसी पार्टी ने किया होता तो सरकार बन सकती थी। तमिलनाडु में ए आई एम डीएमके और डीएमके का पगड़ी पलट प्रोग्राम इस बार भी बदस्तूर जारी रहा लेकिन भाजपा को 3 सीटें आना बहुत दूरगामी संकेत दे रहे हैं। आंध्र प्रदेश के वाईएसआर कांग्रेस का उद्भव और बंपर जीत बताती है कि कुछ अंशों में अभी भाषाई और क्षेत्रीय चेतना शेष है।
एक महत्त्वपूर्ण बात यह भी है कि भाजपा का चुनाव अभियान चमत्कारिक नेता नरेंद्र मोदी पर इस कदर केंद्रीत था कि मुद्दे मुद्दे तो ठीक उम्मीदवार भी गौण हो गए ऐसे में लगता है कि हमारा लोकतंत्र अमेरिका की तरह प्रत्यक्ष लोकतंत्र और की ओर कदम बढ़ा रहा है। कुल करके 2019 के चुनावों ने भारतीय लोकतंत्र को नए आयाम एवं नई ऊंचाइयां दी है।
(लेखक- पूर्व सांसद एवं मध्यप्रदेश भाजपा के प्रवक्ता हैं)