निरोगी काया के लिए आहार संयम की अनिवार्यता
   Date03-Jun-2019
धर्मधारा
म नुष्य को अपनी दैनंदिन आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अर्जित शक्ति के संरक्षण की व्यापक व्यवस्था बनानी पड़ती है। आहार को लेना और समुचित व पौष्टिक तरह से लेना उसी उद्देश्य की अभिपूर्ति के लिए है। लिया जा रहा आहार हमारी आवश्यकताओं को यदि समुचित रूप से पोषित कर पाने की स्थिति में न हो तो शरीर में कमजोरी आने से लेकर रोगों के पनपने तक की स्थिति का सामना हमें करना पड़ जाता है। आवश्यकता इस बात की है कि लिया जा रहा भोजन और ग्रहण किया जा रहा आहार इस तरह से हों कि वे शरीर को ऊर्जा एवं निरोगिता, दोनों प्रदान कर सकें। उस उद्देश्य को भूलकर यदि हम मात्र स्वाद की आपूर्ति के लिए एवं जीभ की लिप्सा के लिए भोजन को करते हैं तो शारीरिक आवश्यकताएँ भी पूरी नहीं होतीं एवं यह शरीर भी बीमारियों का गढ़ बन जाता है। इन दिनों सर्वत्र फैले हुए रोगों व बीमारियों के मूल कारण में जाया जाए तो उनका एक प्रमुख कारण आहार का असंयम कहा जा सकता है। इसीलिए इस वर्ग में आहार का संयम-शक्ति के संरक्षण, संवर्धन व सदुपयोग का एक प्रमुख आधार माना जा सकता है। यह एक सर्वविदित तथ्य है कि प्रकृति के साहचर्य में रहने वाले अन्य प्राणी कदाचित् ही बीमार पड़ते हैं। जंगल में रहने वाले शेर, हाथी इत्यादि को किसने अस्पताल के चक्कर लगाते देखा है। इसका एक मुख्य कारण यह है कि अन्य प्राणी उनके शरीर के लिए आवश्यक आहार व खाद्य पदार्थों को उनके नैसर्गिक या प्राकृतिक रूप में ही ग्रहण करते हैं। यह एक स्वाभाविक एवं विज्ञानसम्मत प्रक्रिया है।
मनुष्य इस साधारण से तथ्य को भूलकर स्वाद-लिप्सा के कारण अनगिनत मसालों, खाना पकाने के तौर-तरीकों को अपनाता है और परिणामस्वरूप ऐसी बीमारियों को जीवन भर के लिए आमंत्रित कर बैठता है, जिनको सहजता से एक संयमित आहारशैली अपनाकर अपने जीवन में आने से रोका जा सकता था। स्वादिष्ट, मसालेदार, तीखा व चटपटा भोजन करने की यह बुरी आदत संपूर्ण मानव जाति की दैनिक दिनचर्या में इस कदर समाविष्ट हो गई है कि इस पर संयम का अंकुश लगाए बगैर इसका त्वरित समाधान होता नजर नहीं आता। पहले चरण में इतना प्रयास तो हरेक को करने की जरूरत है कि स्वाद के वशीभूत होकर भोजन ग्रहण करने के स्थान पर आवश्यकता पडऩे पर खाने की आदत डाली जाए।