सर्वोपरि ज्ञान-दान
   Date23-Jun-2019

उ त्तराखंड के एक प्राचीन नगर में सुबोध नामक राजा राज्य करते थे। महाराज का नियम था कि राजकीय कार्य प्रारंभ होने से पूर्व वे आए हुए याचकों को दान दिया करते थे। इस नियम में उन्होंने कभी भूल नहीं की। एक दिन जब सब लोग दान पा चुके तो एक विचित्र स्थिति आ खड़ी हुई। एक व्यक्ति ऐसा आया जो दान के लिए हाथ तो फैलाए था, पर मुँह से कुछ न कहता था। सब हैरान हुए कि इसे क्या दिया जाए? एतदर्थ बुद्धिमान व्यक्तियों की समिति बैठाई गई। किसी ने कहा वस्त्र देना चाहिए, किसी ने अन्न की सिफारिश की। कोई स्वर्ण देने को कहता, तो कोई आभूषण। समस्या का यथार्थ हल न निकला। सुबोध की कन्या उपवर्गा भी वहाँ उपस्थित थी, उसने कहा-'राजन्, जो व्यक्ति न बोल सकता है, न व्यक्त कर सकता है, उसके लिए द्रव्याभूषण सब व्यर्थ हैं। ऐसे लोगों के लिए सर्वश्रेष्ठ दान तो ज्ञानदान ही है। ज्ञान से मनुष्य अपनी संपूर्ण इच्छाएँ, आकांक्षाएँ आप पूर्ण कर सकता है और दूसरों को भी सहारा दे सकता है। इसलिए इसे ज्ञानदान दीजिए।Ó उपवर्गा की बात सबने पसंद की। व्यक्ति के लिए शिक्षा की व्यवस्था की गई। राजा ने उस दिन अपने दान की सार्थकता समझी। यही व्यक्ति आगे चलकर उसी नगरी का विद्वान मंत्री नियुक्त हुआ। वास्तव में अज्ञान का निवारण ही सच्चा पुण्य-परमार्थ है। यह स्वाध्याय से, ज्ञानार्जन से ही संभव है।