वीर बालक रामसिंह
   Date20-Jun-2019
प्रेरणादीप
अ पनी वीरता के लिए प्रसिद्ध राठौर वीर अमरसिंह शाहजहां के दरबार में ऊंचे पद पर थे। बादशाह के साले सलावतखां ने उनका भरी सभा में अपमान कर दिया। अमरसिंह ने वहीं भरे दरबार में उसका सिर काट कर फेंक दिया। किसी की हिम्मत नहीं हुई कि अमरसिंह को रोके या कुछ कहे। मुसलमान दरबारी अपनी जान बचाकर इधर-उधर छिप गए। अमरसिंह का साला, नीच स्वभाव के अर्जुन गौड़ को बादशाह ने लालच में फंसा लिया। वह धोखा देकर अमरसिंह को बादशाह के दरबार में ले गया। जब अमरसिंह छोटे दरवाजे से भीतर घुस रहे थे, तभी अर्जुन ने पीछे से वार कर उन्हें मार दिया। प्रसन्न शाहजहां ने उनकी लाश को चील-कौओं को खाने के लिए किले की बुर्ज पर डलवा दिया। अमरसिंह की पत्नी ने सती होने का निश्चय किया, जो बिना लाश मिले पूरा नहीं हो सकता था। रानी ने बहुत से सरदारों से प्रार्थना की, पर बादशाह से शत्रुता लेने के डर से कोई भी तैयार न होने पर स्वयं ही तलवार उठाकर चल पड़ी। इसी समय उनका भतीजा रामसिंह आ गया। वह अमरसिंह के बड़े भाई जसवन्तसिंह का लड़का था। सती रानी से आशीर्वाद लेकर पन्द्रह वर्ष का वीर बालक घोड़े पर सवार हो सीधा महल की ओर चल दिया। वह बुर्ज के नीचे पहुंचा, तो सैकड़ों मुसलमानों ने घेर लिया। रामसिंह को मरने-जीने की चिंता नहीं थी। उसने लाश को कंधे पर रखा, मुंह में घोड़े की लगाम दबाई और दोनों हाथों से तलवार चलाकर सैकड़ों नहीं, हजारों मुसलमानों को मारता हुआ, उनकी लाशों के ऊपर से चलता, वह किले से बाहर आ गया। लाश प्राप्त कर रानी सती हुई। उसने आशीर्वाद दिया - बेटा! गौ, ब्राह्मण, धर्म और सती ी की रक्षा के लिए जो संकट उठाता है, श्री भगवान उस पर प्रसन्न होते हैं।