मोदी मंत्र पर राष्ट्रवाद की मुहर...
   Date02-Jun-2019
शक्तिसिंह परमार
भा रतीय लोकतंत्र की सर्वोच्च पंचायत 'लोकसभाÓ के लिए हुए 17वें आम चुनाव में जिस ऐतिहासिक बहुमत के साथ किसी गैर कांग्रेसी सरकार ने लगातार दूसरी बार सत्ता में वापसी की है, यह बहुत ही महत्वपूर्ण एवं राष्ट्रीय राजनीति के फलक पर ऐसा अध्याय है, जिसकी प्रतिध्वनि सिर्फ पांच साल यानी आने वाले 2024 के लोकसभा चुनाव तक नहीं, बल्कि पांच दशकों तक सुनाई देती रहेगी... क्योंकि 48 साल के बाद स्पष्ट बहुमत से अधिक यानी जादुई आंकड़े 272 से अधिक सीटें लाने का तमगा सिर्फ अब तक कांग्रेस के पास ही था, जिसे भाजपा ने नरेन्द्र मोदी के चमत्कारी नेतृत्व एवं अमित शाह के प्रबंधन कौशल ने न केवल धराशायी किया, बल्कि यह बिल्ला भी अब अपनी पार्टी के पक्ष में लगाने में सफलता हासिल की है... इसलिए यह नतीजे केवल हार-जीत के मान से नहीं, बल्कि आगामी पांच वर्षों की नीति, निर्णय और राष्ट्र नेतृत्व की नीयत के उस पड़ाव का भी संकेत कर रहे हैं, जो 'न्यू इंडियाÓ अर्थात् नए भारत के निर्माण के साथ एक ऐसे सशक्त राष्ट्र के रूप में भारत को खड़ा करने का संकल्प लेकर आगे बढ़ रहे हैं, जिसमें भारत विश्व का नेतृत्वकर्ता न केवल नजर आएगा, बल्कि अगवा भी बनेगा... क्योंकि इस 17वीं लोकसभा के लिए भाजपा की इस महाविजय में मोदी के उस मंत्र पर राष्ट्रवाद ने मुहर लगाई है, जो 'सबका साथ-सबका विकासÓ से आगे बढ़कर 'सबका विश्वासÓ को नया आयाम दे रहा है...
17वीं लोकसभा के लिए मतगणना अर्थात् जनादेश की वह घड़ी 23 मई 2019 सबको याद रहेगी, जब कुल 543 में से 542 सीटों के नतीजे घोषित किए गए और भाजपा ने अकेले 303 व राजग सहयोगियों के साथ 353 का ऐतिहासिक आंकड़ा छुआ, जबकि कांग्रेस अकेले 52 और संप्रग सहयोगियों के साथ दहाई अंक 92 पर सिमट गई। यही हाल सपा, बसपा, बीजद समेत अन्य दलों का रहा, जो 97 से आगे नहीं बढ़ पाए... भाजपा ने गुजरात, राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली, अरुणाचल, त्रिपुरा में सभी लोकसभा सीटें जीतकर पूर्ण कब्जा किया... वहीं कांग्रेस का गुजरात, राजस्थान, हरियाणा, आंध्रप्रदेश, दिल्ली, अरुणाचल, ओडिशा, हिमाचल, उत्तराखंड एवं पूर्वोत्तर के साथ करीब डेढ़ दर्जन से अधिक राज्यों में पार्टी का खाता भी नहीं खुला... कांग्रेस 2014 के 44 से बढ़कर सिर्फ 52 तक पहुंच पाई... सपा 2014 में 5 पर थी और 5 पर ही सिमट गई... तृणमूल ने 2014 की 34 में से सिर्फ 22 बचाई... जबकि लालू की राजद 2014 की 4 को गंवाकर शून्य पर और बसपा 2014 के शून्य से उभरकर 10 पर पहुंच सकी...
करीब सवा दो माह से अधिक 17वीं लोकसभा का चुनाव प्रचार अनेक आरोप-प्रत्यारोप, वादे-इरादे के साथ ही राजनीतिक दलों के विषैले बयानों से लोकतांत्रिक व राजनीतिक मर्यादाओं को तार-तार करता नजर आया... लेकिन जनता-जनार्दन ने अपना आपा नहीं खोया... उन्होंने सबको सुना, लेकिन चुनने के पहले अपने राष्ट्रहित के मंत्र को पहले पायदान पर रखा... कांग्रेस ने गरीबों को 72 हजार प्रतिवर्ष देने के लिए 'न्याय योजनाÓ का दांव खेला, किसानों को कर्जमाफी और युवाओं को 22 लाख रोजगार (सरकारी नौकरी) का सपना भी दिखाया... यही नहीं, मोदी सरकार को घेरने के लिए राफेल सौदे को बार-बार उठाकर चौकीदार चोर का जुमला भी गढ़ा, लेकिन कांग्रेस के इन सारे बयानी और मुद्दाई तीरों पर भाजपा का राष्ट्रीय सुरक्षा, विकास, गरीबी, किसान और राष्ट्रवाद का मंत्र भारी पड़ा... मोदी के नेतृत्व में भाजपा की इस महाविजय को इन आंकड़ों के जरिये आसानी से समझा जा सकता है कि आज भाजपानीत राजग 353 सीटों के साथ देश के 55.90 प्रतिशत हिस्से पर काबिज है... जबकि कांग्रेस महज 52 सीटों के साथ 9.04 हिस्से पर अपनी दखल रखती है... ऐसे में जो यहां आंतरिक जनसमर्थन मोदी के पक्ष में सुनामी के रूप में सामने आया है, यह भविष्य की राजनीति को नए तरीके से परिभाषित करने में भी सफल हुआ...
2019 के लोकसभा चुनाव ने मजबूत सरकार, मजबूत नेतृत्व के वादों पर अमल करते हुए जातिवाद, भाई-भतीजावाद, वंशवाद, मुस्लिम तुष्टीकरण, जातियों को भिड़ाने वाले घृणित राजनीतिक जुमलों और उन तमाम राजनीतिक हथकंडों को धराशायी कर दिया है, जो कैसे भी वोटों को आपस में काटकर, आपस में भिड़ाकर, भ्रमित करके उनके वोट मूल्य को मूल्यहीन करने में लगातार कामयाब होकर 20 से 30 फीसदी वोट पाकर भी दशकों से सरकार बनाते और चलाते रहे हैं... इस बार मोदी को जातिवाद, भाई-भतीजावाद पर नहीं, राष्ट्र की मजबूती एवं राष्ट्रीय एकता पर करीब 45 फीसदी वोट समर्थन मिला है... जो अपने आप में राजनीतिक इतिहास में ऐतिहासिक है...
लोकसभा चुनाव में 'अबकी बार 300 पारÓ.., 'मोदी है तो मुमकिन है..,Ó 'मैं भी चौकीदार..,Ó 'एक बार फिर मोदी सरकार..,Ó के नारों के बीच भाजपा ने जिस ऐतिहासिक बहुमत की पटकथा को लिखने में सफलता पाई है, इसके पीछे जनता-जनार्दन की वह उच्चतम आशा-आकांक्षा एवं राष्ट्रीय भाव छुपा है, जो देश को मजबूत हाथों में देखना चाहता है... फिर इसके लिए उन्हें नोटबंदी/जीएसटी जैसी कड़वी दवाई भी गटकने में कोई परेशानी होती नजर नहीं आ रही... सही मायने में यह निर्णायक एवं महाविजय वाला बहुमत जनता ने सोच-समझकर मोदी की झोली में डाला है... जब प्रत्येक सभा में नरेन्द्र मोदी ने जनता से सारे वोट उनके खाते में डालने यानी चेहरा या प्रत्याशी देखने के बजाय सिर्फ मोदी को देखकर वोट करने के लिए आव्हान किया, तो जनता ने भी इसे हाथों-हाथ दिया... यानी जनता ने अपना राष्ट्रधर्म या कहें राष्ट्रीय कर्तव्य बहुत ही सफलतापूर्वक निर्वाह किया है... अब बारी केन्द्र में सत्तारूढ़ हो चुकी नरेन्द्र मोदी सरकार की है कि वह अपने वादों-इरादों के साथ अंतिम व्यक्ति तक अपनी पहुंच बनाकर बताए, बल्कि बदलाव का श्रीगणेश भी वहीं से करके दिखाए...
महंगाई, बेरोजगारी सबसे ज्वलंत समस्या और विषय है... सरकार भले ही आंकड़ों की जादूगरी के जरिये महंगाई घटाने, विकास दर बढ़ाने और रोजगार बढ़ाने के गत पांच वर्ष में खेल खेलती रही हो, लेकिन अब इन पांच वर्षों में इन तीनों ही विषयों पर वास्तविक कार्य होना चाहिए... जो जनता को वास्तव में अपने 'जनादेशÓ पर गुमान करने का भी अवसर दे सके... पारदर्शी शासन व्यवस्था के लिए पहली पारी में जितने भी कड़े फैसले सरकार ने लिए हैं, अब उनके परिणाम वास्तविकता में सामने आना चाहिए... वरना नोटबंदी जैसा हश्र आम जनता को तोडऩे का ही कारण बनता नजर आ रहा है... देश में कानून का राज एवं सीमाओं की सुरक्षा के साथ आतंकवाद के मुद्दे पर अब जीरो टॉलरेंस के साथ ही समझौता न करने के साथ ही स्थायी समाधान वाले कदम भी बढ़ाने होंगे... मोदी की इस महाविजय में जनता-जनार्दन की आसमानी आशाएं, आसमानी विश्वास एवं वे तमाम आकांक्षाएं समाहित हैं, जो उन्हें समाधानकर्ता मोदी के रूप में दिखाई दे रही है... अब मोदी सरकार अपने पांच वर्षों की रोडमेप और जनता के सामने जुलाई में प्रस्तुत किए जाने वाले बजट में रखकर उसी तरह से तेज कार्य नीति के साथ आगे बढ़े, ताकि जिस मोदी मंत्र पर जनता-जनार्दन ने जनादेश के जरिये महाविजय की मुहर लगाई थी... वह सार्थकता प्राप्त कर सके...