'हिन्दी मीडियम और हमारी शिक्षा व्यवस्था...
   Date15-Jun-2019


ब्रेक के बाद - शक्तिसिंह परमार
शि क्षा ही एकमात्र ऐसा माध्यम है, जो मनुष्य के सर्वांगीण विकास के साथ ही उसकी सोचने-समझने की शक्ति एवं उसे अधिकार सम्पन्न बनाने की दक्षता प्रदान करती है... शिक्षा का प्रकाश ही व्यक्ति को तमाम तरह के अंधकारों से निकालकर प्रकाश के मार्ग पर प्रशस्त करता है... आजादी के बाद जिस तरह की शैक्षणिक व्यवस्थाएं एवं पाठ्यक्रमों का निर्माण भारत में हुआ, उसमें कहीं-न-कहीं मैकाले की वह शिक्षा एवं सोच समाहित रही, जिसने पेशेवर रूप में डिग्रीधारी शिक्षित तबका तो बड़े जतन के साथ भारत में तैयार व खड़ा किया, लेकिन संस्कारों, संस्कृति एवं समाज-राष्ट्र के निर्माण में महती भूमिका के निर्वहन को तैयार एक जिम्मेदार नागरिक का निर्माण करने वाली शिक्षा का कहीं-न-कहीं उसी दौर में लोप होता चला गया... परिणामत: आज शिक्षा एक ज्ञान या संस्कार के बजाय व्यवसाय व उद्योग का रूप ले चुकी है... जिसके परिणाम भी हमारे सामने भिन्न-भिन्न रूप में घातक तरीके से सामने भी आ रहे हैं... इसलिए शिक्षा नीति का प्रारूप और उसका क्रियान्वयन क्या हो..? यह अच्छे से एवं भली-भांति तरीके से सरकार को एवं नीति-नियंताओं को तय करना होगा... नया शिक्षा मसौदा कौन-सा मार्ग प्रशस्त करेगा, यह अभी देखने लायक है...
मध्यप्रदेश के साथ ही देशभर में 1 अप्रैल को नया शैक्षणिक सत्र 2019-20 प्रारंभ हो चुका है... जिसका दूसरा चरण 15 जून से प्रारंभ होने वाला था, लेकिन अब 24 जून से यह शुरू होगा... नया शैक्षणिक सत्र कब से प्रारंभ हो, इसके लेकर लंबे समय से एक बहस एवं चर्चा निरंतर चल रही है... क्योंकि बच्चे परीक्षाएं देकर निर्वत्त होते ही हैं और उन्हें तुरंत नए शिक्षा सत्र अर्थात नई कक्षा में बैठा दिया जाता है... कितने दिन कक्षाएं लगेंगी, यह गर्मी के रुख पर निर्भर करता है... क्योंकि 1 अप्रैल से नया सत्र प्रारंभ होने तक तो गर्मी चरम पर पहुंचने लगती है... फिर जब नए शैक्षणिक सत्र का दूसरा पड़ाव 15 जून निर्धारित किया जाता है, तब भी इसके क्रियान्वयन पर गर्मी का हुक्म चलता है... जैसा इस बार हुआ... 15 को खुलने वाले थे, गर्मी के चलते 24 को खुल रहे हैं... इस पूरे मामले में पालक-शिक्षक के साथ ही विद्यार्थी भी परेशानी से दो-चार होते हैं... क्योंकि न तो व्यवस्थित तरीके से नया शैक्षणिक सत्र 1 अप्रैल से पूरे माह संचालित हो पाया और न ही उसका दूसरा पड़ाव अपने निर्धारित समय से प्रारंभ हो सका... ऐसे में क्यों न अपने पुराने शैक्षणिक कार्यक्रम जिसे हम गुरुकुल पद्धति के नाम से भी समझते आए हैं... उसका अनुसरण करते हुए 1 जुलाई से प्रारंभ करें, ताकि गर्मी व अन्य समस्याओं का कोई व्यवधान ही शुभ कार्य के समय न आए...
भारत में अब तीन तरह के शैक्षणिक वर्ग खड़े हो चुके हैं और तीन भागों में शिक्षा के जरिये विभक्त होता यह भारत अनेक समस्याओं से भविष्य में दो-चार होने वाला है और हो भी रहा है... एक वह वर्ग है, जो सिर्फ सरकारी स्कूलों की शिक्षा व्यवस्था के भरोसे अपनी शैक्षणिक दक्षता की पूर्ति को आश्रित है... सबको मालूम है कि सरकारी स्कूलों की शैक्षणिक गतिविधियां किस दौर से गुजर रही हैं... दूसरे वर्ग वह है, जो सरकारी से मुँह मोड़कर निजी स्कूलों की तरफ रुख करता है... और वहां पर भी शैक्षणिक गुणवत्ता, संसाधनों से इतर मोटी फीस पर ही ध्यान केन्द्रित करने वाले गिरोह के चलते क्या स्थितियां निर्मित होती हैं, सबको पता है... एक तीसरा शैक्षणिक वर्ग उस पब्लिक स्कूल ने तैयार किया है, जो इन दोनों वर्ग को अपनी नजर में हेय दृष्टि से देखता है, मानो उनका सरकारी में या छोटे निजी स्कूलों में अध्ययन करना पाप हो... जब ये तीनों ही वर्ग विद्याध्ययन के बाद निकलते हैं, तो इनमें परस्पर रूप से एक तरह का विरोधाभासी स्वभाव व प्रवृत्ति जन्म ले चुकी होती है... क्योंकि तीनों के ही गणवेश से लेकर शैक्षणिक गतिविधियां, रहन-सहन व प्रदर्शन के अन्य तौर-तरीके भी उन्हें भिन्नता के चरम पायदान पर ले जाते हैं... पहले दो ही गणवेश थे, एक था गुरुकुल का विद्याध्ययन का वह भाव, जिसमें राजकुमार से लेकर एक छोटा गरीब बच्चा भी एक ही गणवेश में उपस्थित रहता था... दूसरा था सरकारी स्कूलों का वह गणवेश, जिसमें सभी बच्चे एक समान दिखते थे... लेकिन अब भांति-भांति के रंग-बिरंगे गणवेश के साथ ही शिक्षा संस्कारों का मूल्यांकन भी मानो आपकी जेब की क्षमता से निर्धारित होने लगा है... इसलिए जब तक शैक्षणिक क्षेत्र में न केवल गणवेश, बल्कि पाठ्यक्रम से लेकर हर तरह की समरूपता यानी कि समानता का निर्धारण नहीं होगा, तब तक सोचने-समझने की दृष्टि से आसमानी अंतर रखने वाली ऐसी पीढिय़ां निर्मित होंगी, जो एक-दूसरे को फूटी आँख न सुहाती हो... तो फिर इसका परिणाम भी कितना घातक होगा, हम देख रहे हैं और देखेंगे...
सरकारी स्कूलों में प्रवेशोत्सव के लिए जोरदार तैयारियां चल रही हैं... इस संदर्भ में यही कहा जा सकता है कि जिस तरह से शासन-प्रशासन एवं जनप्रतिनिधि से लेकर स्कूल प्रशासन, पालक-शिक्षक संघ पहले दिन की चमक-दमक व सक्रियता से सरकारी स्कूलों में पढ़ाई के लिए चिंतित नजर आते हैं, सारी व्यवस्थाएं (तामझाम) जुटाते हैं... वही सक्रियता वर्षभर बनी रहे, तो सच में सरकारी स्कूलों की शिक्षा एवं व्यवस्था दोनों का कायाकल्प संभव है... क्योंकि = बच्चों के लिए प्राथमिक स्तर के स्कूलों में प्राथमिक स्तर की आवश्यकता जैसे पेयजल-शौचालय अभी भी उपलब्ध नहीं हैं... = स्कूलों में शिक्षकों की कमी, तो कहीं-कहीं बच्चों-शिक्षकों का अनुपात भी पूरी तरह से गड़बड़ाया रहता है... परिणामत: अनेक स्थानों पर पूरा स्कूल (प्राथमिक) एक शिक्षक के भरोसे, तो कुछ स्थानों पर तीन-तीन स्कूल दो-दो शिक्षकों के भरोसे छोड़ दिए गए हंै... फिर पढ़ाई होगी कैसे..? = वर्षभर मध्यान्ह भोजन में गड़बड़ी, दूषित भोजन, काकरोच, छिपकली, मेंढक निकलना पूरे सरकारी ढर्रे को बदनाम कर चुका है... = समय-समय पर दूरस्थ ग्रामीण क्षेत्रों के स्कूलों में बच्चों के साथ ही शिक्षकों एवं पूरे स्टाफ की उपस्थिति के साथ दक्षता का भी तुलनात्मक परीक्षण जरूरी है... तभी इस तरह के प्रवेशोत्सव, स्कूल चलें अभियान या फिर वर्तमान में जॉयफुल लर्निंग अर्थात आनंदमयी एवं भयमुक्त वातावरण में विद्या अध्ययन में कारगर साबित होंगे...
दूसरा सरकारी कर्मचारियों, अधिकारियों एवं उन नौकरशाहों के बच्चे कहां अध्ययन करते हैं, जो सरकारी स्कूलों की शैक्षणिक गुणवत्ता की निगरानी के लिए जिम्मेदार है..? करीब 95 से 98 फीसदी सरकारी स्कूलों के शिक्षकों के बच्चे ही जब निजी में या फिर पब्लिक स्कूल में अध्ययन को जाएंगे तो शिक्षा सुधार कैसे संभव होगा..? साथ ही यह भी ध्यान रखना होगा कि निजी व पब्लिक स्कूल के शिक्षकों की भांति सरकारी स्कूल के शिक्षकों को मुक्त नहीं रखा जाता, जनगणना, मतगणना, मतदान, पोलियो अभियान, मतदाता सूची निर्माण और अन्य तरह के कार्यों में जब उन्हें खपाये रखा जाएगा तो वे खाक शैक्षणिक दायित्व का निर्वाह कर पाएंगे..? साथ ही मध्यान्ह भोजन जैसी व्यवस्था ने भले ही विद्यार्थियों की संख्या बढ़ा दी हो, लेकिन पालक-शिक्षक के बीच इस व्यवस्था ने गड़बडिय़ों के साथ ही भ्रष्टाचार को भी बढ़ाया है... ऐसे में शैक्षणिक गतिविधियों का पूरा दारोमदार सरकार की मंशा पर निर्भर है कि वह सरकारी शैक्षणिक प्रकल्प को कितने समय जिंदा रखना चाहती है... क्योंकि गत वर्ष आई फिल्म 'हिंदी मीडियमÓ ने हमारी शिक्षा व्यवस्था के दौर का बहुत ही गंभीरता से खुलासा कर दिया है...