कम्युनिस्टों का इतिहास दोहरा रहीं ममता
   Date12-Jun-2019
इन दिनों प. बंगाल की ममता ब
नर्जी सरकार वहां की जनता और केन्द्र सरकार के लिए एक समस्या बन गई है। वहां राजनीतिक हत्याएं हो रही है। ममता बनर्जी मुख्यमंत्री के नाते उन पर कानून व्यवस्था बनाए रखने का दायित्व है, वे स्वयं एक पार्टी बनकर अपने विरोधियों की हत्याएं करा रही है, स्वयं एक जिहादी नारा बुलंद कर रही है कि जो हमसे टकराएगा वह चूर-चूर हो जाएगा। अधिकांश राजनीतिक हत्याएं स्वयं ममता बनर्जी के द्वारा प्रायोजित बताई जाती है। गत लोकसभा चुनाव में 40 में से 18 सीटों पर भाजपा ने जीत दर्ज की। पहले केवल दो सीटों पर भाजपा जीत दर्ज कर सकी थी। अब छह गुना अधिक सीटों पर भाजपा विजयी होने और उसका मत प्रतिशत चालीस प्रतिशत पहुंचने से ममता बनर्जी की राजनीतिक जमीन खिसक रही है। हर क्षेत्र के मतदाताओं का मनोविज्ञान जानना जरूरी है। प. बंगाल शक्ति की देवी माँ काली की पूजा करता है। वहां के क्रांतिकारियों ने देश की आजादी के लिए बलिदान दिया। यही भूमि सुभाषचन्द्र बोस और डॉ. श्यामाप्रसाद मुखर्जी के प्रखर राष्ट्रवादी विचारों की जननी है। यहीं से वंदे मातरम् के मंत्र का शंखनाद हुआ। इसलिए प. बंगाल ने कभी भी अधिक समय तक अत्याचार बर्दाश्त नहीं किया। प. बंगाल की जनता अन्याय और अत्याचार के विरोध में तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त करती है। तीन दशक तक वहां कम्युनिस्टों का शासन रहा। जब कम्युन्सिटों के अत्याचार के विरोध में जनता को विकल्प के रूप में ममता बनर्जी का नेतृत्व मिल गया तो जनता ने कम्युनिस्टों का शासन जड़मूल से उखाड़ फेंका। आज कम्युनिस्टों की हालत यह है कि वहां एक भी लोकसभा सीट पर कम्युनिस्ट जीत दर्ज नहीं करा सके। जनता ने कम्युनिस्टों के विचार को भी पूरी तरह नकार दिया है। अब ममता बनर्जी भी कम्युनिस्टों का इतिहास दोहरा रही है। भाजपा को रोकने के लिए ममता बनर्जी ने अत्याचार, हिंसा का माध्यम अपनाया है। हिंसा की भयानक तस्वीर परगना में देखी जा सकती है। गांव हाट गांधी और राजबरी में तीन भाजपा कार्यकर्ताओं की हत्या कर दी गई। पांच कार्यकर्ता चुनाव के बाद से ही गायब है। आम चुनाव में भाजपा को दो बूथों पर बढ़त मिली थी। वहां जब टीएमसी कार्यकर्ता भाजपा के झंडे फहराने लगे तो उन्हें गांव के बासूदेव ने रोकना चाहा तो टीएमसी के गुंडों ने उसे चाकू घोंप दिया। एक रिश्तेदार के अनुसार प्रदीप व उनके भाई सुकोत को झाडिय़ों में भागते देखा। सौ लोग उनका पीछा कर रहे थे, वे तालाब में कूद गए, लेकिन हमलावरों ने उन्हें गोली मार दी।
दृष्टिकोण
भ्रष्टाचार पर निर्णायक कार्रवाई
चर्चा में लोग यह सवाल करते हैं कि मोदी सरकार ने उच्च स्तरीय स्तर पर भ्रष्टाचार पर लगाम लगा दी है। केन्द्रीय मंत्री हो या प्रमुख सचिव हो उनके बारे में कोई भ्रष्टाचार की चर्चा नहीं करता। जबकि पहले यह मान्यता थी कि राजनीति का व्यवसायीकरण हो गया है, इसलिए देश की राजनीति भ्रष्टाचार से चल रही है। लेकिन अब ऐसी बातें मोदी-अमित शाह की टीम ने इस बुराई को ऊपरी स्तर पर समाप्त करने में सफलता प्राप्त की है। लेकिन निचले स्तर पर अब भी भ्रष्टाचार है। अफसर, प्रशासन, पुलिस में भ्रष्टाचार की कर्इं शिकायते है। आम लोगों की धारणा है निचले स्तर के भ्रष्टाचार को दूर करना कठिन है। अब लगता है कि इस स्तर के भ्रष्टाचार के खिलाफ मोदी सरकार ने कार्यवाही प्रारंभ कर दी है। आयकर विभाग के दर्जनभर भ्रष्ट अधिकारियों को सेवा मुक्त कर दिया है। 1985 बैच के आईआरएस अधिकारी अशोक अग्रवाल की भी छुट्टी कर दी गई है। जिन पर आरोप है कि चंद्रास्वामी की मदद करने वाले एक कारोबारी से रकम वसूल की थी। इस सूची में ऐसे अधिकारियों के नाम भी है, जिन्होंने तीन करोड़ से अधिक की सम्पत्ति अर्जित की है। ऐसे अधिकारी भी है, जिन्हें घूस लेते सीबीआई ने गिरफ्तार किया था। इस प्रकार अफसर स्तर पर भ्रष्टाचार के खिलाफ मोदी सरकार ने निर्णायक कार्यवाही प्रारंभ की है। इस संदर्भ में वोरा कमेटी की एक रिपोर्ट 1993 में सरकार को सौंपी गई थी। इसमें आर्थिक क्षेत्र में लांबिया, तस्कर गिरोह, माफिया तत्वों के साथ भ्रष्ट नेताओं और अफसरों की सांठगांठ को तोडऩे के उपाय भी बताए गए है। यह रिपोर्ट इतनी सनसनी थी कि तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने इसे सार्वजनिक नहीं किया। अब पहली बार उन माफिया तत्वों पर कार्यवाही प्रारंभ हुई है, जिनका जिक्र वोरा रिपोर्ट में था। उम्मीद की जा रही है कि भ्रष्ट तत्वों के खिलाफ मोदी-शाह की सरकार निर्णायक कार्यवाही करेगी। यदि अफसर और निचले स्तर के भ्रष्टाचार को खत्म करने में इस सरकार को सफलता मिली तो यह न केवल मोदी सरकार की बड़ी उपलब्धि होगी, वरन् जनता को भी बड़ी राहत मिलेगी। यह धारणा भी खत्म होगी कि निचले स्तर के भ्रष्टाचार की जड़े इतनी गहरी है कि उनको खत्म करना कठिन है।