लोभ की अतृप्त वृत्तियां जन्म देती हैं क्रोध को
   Date11-Jun-2019
धर्मधारा
वृत्तियां अपने आप में बुरी नहीं होती हैं। सवाल है उनके जुडऩे का। देव से जुड़कर वे सद्गुण बन जाती हैं और दानव से जुड़कर दुर्गुण। यह वैसे ही हो जाता है, जैसे निर्मल जल नाली में गिरने से गंदा हो जाता है। ब्रह्मा काम के देवता हैं। काम की कोख से सृजन का जन्म होता है। इसीलिए ब्रह्मा को सृष्टिकर्ता कहा जाता है। भगवान् कृष्ण स्वयं गीता में कहते हैं कि 'मैं इच्छाओं में काम हूं।Ó यही उदात्त काम परमात्मा से जुड़कर भक्ति बन जाता है। 'राम मोरे पिउ मैं राम की बहुरिया।Ó परंतु जब यही काम वासना के कीचड़ में फंसता है, तो अनर्थकारी व्यभिचार का रूप ले लेता हैं, 'काम भुजंग डसत जब जाही। कटुक निम्ब तब लगत न ताही।Ó जहां राम का काम लोकमंगल का कारण बनता है, वहां रावण का काम सर्वनाश का कारण। विष्णु लोभ के देवता हैं। विष्णु से जुड़ते ही लोभ सकल ब्रह्माण्ड का पालक बन जाता है। तिमव्ययी समाज के लिए कुछ कर गुजरता है और दुव्र्यसनी स्वयं मिट जाता है। कंजूस का गड़ा हुआ धन किस काम का? धन परमात्मा की विभूति है। अत: इसे लोकसंग्रह के क्षेत्र में निरंतर बहते रहना चाहिए। धन-संग्रह बुरी चीज नहीं है, यदि वह समाज के हित में नियोजित हो। हम धन के मालिक न होकर उसके 'ट्रस्टीÓ हैं। व्यक्ति केंद्रित धन शोषण को बढ़ावा देता है। इसे असुरों के हाथ में नहीं होना चाहिए। कुबेर का खजाना देवताओं के अभ्युदय के लिए था। जब वह रावण के हाथ में चला गया, तो संतों का उत्पीड़क बन गया। शंकर को क्रोध का देवता माना जाता है। नवसृजन के लिए ध्वंस जरूरी है। सृजन और संहार दोनों सृष्टि के विधान के अंतर्गत हैं। असंयमित काम को अनुशासित करने के लिए शिव को तीसरा नेत्र खोलना पड़ा था। राजा बलि के दान के दम्भ को मिटाने के लिए भगवान को वामन का रूप धारण करना पड़ा था। काम और लोभ के विजेता परशुराम के क्रोध के शमन के लिए भगवान् राम को झुकना पड़ा था। काम, लोभ और क्रोध की वृत्तियां जब वासनाजन्य इच्छाओं को तृप्त करने में लग जाती हैं, तब समाज के चारों ओर अनर्थ घटने लगता है। गोस्वामी तुलसीदास बड़े सलीके से संकेत करते हैं:
लोभ के इच्छा दंभ बल काम के केवल नारि।
क्रोध के परुष वचन बल मुनिवर कहहिं बिचारि।।
काम और लोभ क्रियाएं हैं और क्रोध इनकी तीखी प्रतिक्रिया हैं। यानी काम और लोभ की अतृप्त वृत्तियां क्रोध को जन्म देती है : 'कामात् क्रोधो..भिजायते।Ó